प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार में आए दिन महंगाई, बेरोज़गारी और गैरबराबरी की खबरें आती रहती हैं। भाजपा नेताओं से अगर इन मुद्दों पर सवाल किए जाए, तो वह बहस का रुख मोड़ कर ‘मंदिर-मस्जिद’ पर बयान देने लगते हैं। सरकार की इस लापरवाही और नज़रअंदाज़गी के बीच भारत में बढ़ती असामनता की एक और खबर सामने आई है। देश में पिछले साल 84 प्रतिशत परिवारों की आय घटी है, तो वहीं अरबपतियों की संख्या तेज़ी से बढ़ी है।

‘वर्ल्ड इकनोमिक फोरम’ के शिखर सम्मलेन से ठीक पहले जारी हुई ऑक्सफेम रिपोर्ट में बताया गया है कि वर्ष 2021 में भारत में अरबपतियों की संख्या 102 से बढ़कर 142 हो गई। एक साल में ही इन अरबपतियों की कुल दौलत बढ़कर करीब 720 बिलियन डॉलर हो गई। बड़ी बात है कि ये संख्या देश की सबसे गरीब 40 प्रतिशत आबादी की कुल संपत्ति से भी ज़्यादा है। इस रिपोर्ट में ये भी बताया गया है कि भारत के 84 प्रतिशत परिवारों की आय कम हो गई है।

खैर, ये आंकड़ें हैरान करने वाले नहीं है। ऐसा इसलिए क्योंकि बीते कई सालों से कुछ ऐसे ही आंकड़ें सामने आ रहे हैं। यूँ तो देश में हमेशा से असमानता रही है, लेकिन अब अमीर-गरीब के बीच का फासला तेजी से बढ़ता जा रहा है।

पिछले साल के नवंबर महीने में देश की होलसेल यानी थोक महंगाई 12 साल के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई थी। फ्यूल, सब्ज़ी, दूध और अंडे के दाम बढ़ने से लोगों पर बोझ बढ़ा था। साथ ही 68 लाख सैलरीड लोगों की नौकरियां छिन गई थी। इसके अलावा रोज़गार की क्वालिटी में गिरावट की खबर भी सामने आयी आई थी। ज़्यादातर लोग खराब नौकरी और दिहाड़ी मज़दूर करने को मजबूर हो रहे हैं, वहीं अम्बानी-अडानी जैसे उधोगपतियों की संपत्ति में दिन दूनी रात चौगुना तरक्की हो रही है।

वर्ष 2021 में आई एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार एक साल में भारत में गरीबों की संख्या दोगुनी हुई है। प्यू रिसर्च सेंटर की इस रिपोर्ट में बताया गया है कि एक दिन में 150 रूपए भी न कमा पाने वाले लोगों की संख्या बहुत तेज़ी से बढ़ी है। 6 करोड़ लोग एक साल के अंदर इस श्रेणी में आ गए हैं।

इन आंकड़ों में छुपी देश की बदहाल तस्वीर के बीच भी प्रधानमंत्री और गृहमंत्री चुनावों में ‘खुशहाल भारत’ का दावा कर रहे हैं। इससे बड़ी विडंबना ये कि जिस सरकार में सबसे अधिक गैरबराबरी बढ़ रही है, उसी सरकार के नेता ‘सबका साथ-सबका विकास’ का दावा भी कर रहे हैं।

बाकी सच तो ये है कि जनता को सच बताया नहीं जा रहा। चुनाव आते हैं, वादे लाते हैं। फिर खत्म होते चुनाव के साथ वादे भी टूट जाते हैं। लेकिन जो कभी नहीं टूटता वो है अमीरी-गरीबी का चक्र।

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