प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 7 साल के कार्यकाल में अर्थव्यवस्था की जो बदहाली हुई है वो किसी से छुपी नहीं है। निजीकरण, बेरोजगारी, जीडीपी का गिरना, रूपए का मूल्य घटते जाना – ये सब कुछ भाजपा सरकार के आने के बाद लगातार होता चला जा रहा है।

रेल, जंगल, कोयला आदि जैसे देश के बहुमूल्य संसाधनों का निजीकरण करने के बाद अब ये सरकार तेल एवं गैस क्षेत्र के उपक्रमों को बेचने को तैयार है।

मोदी सरकार के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने तेल एवं गैस क्षेत्र के उपक्रमों में स्वतः मंजूर मार्ग से 100 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की अनुमति देने के प्रस्ताव पर विमर्श करने के लिए कैबिनेट नोट का मसौदा जारी किया है।

मामले से जुड़े सूत्रों ने जानकारी देते हुए कहा है कि यह मसौदा उन उपक्रमों के लिए है जो विदेशी निवेश के लिए सैद्धांतिक रूप से तैयार हैं।

आसान भाषा में कहा जाए तो बी.पी.सी.एल के विदेशी निवेश का पूरा रास्ता अब साफ है। देश की दूसरी सबसे बड़ी तेल रिफायनरी कंपनी भारत पेट्रोलियम कॉर्परेशन लिमिटेड (BPCL) केंद्र की मंजूरी के बाद पूरी तरह निजी हाथों में बिक जाएगा।

निजीकरण के बिना केंद्र की बीपीसीएल में 52.98 फीसदी की हिस्सेदारी है। यदि इस कदम को मंत्रीमंडल की मंजूरी प्राप्त हो जाती है तब ये 52.98 फीसदी की हिस्सेदारी भी निजी हाथों में होगी।

ऐसा करने के लिए FDI नीति में पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस से संबंधित नया प्रावधान भी जोड़ा जाएगा।

फिलहाल बीपीसीएल की 52.98 फीसदी हिस्सेदारी के अधिग्रहण के लिए वेदांता समूह ने अपना रुचि पत्र केंद्र को दिया है। इसके अलावा बीपीसीएल की दावेदारी में गलोबल समूह भी सामने आ रहे हैं जिनमें अपोलो ग्लोबल मैनेजमेंट जैसी नामी कंपनियां भी हैं।

1952 में बीपीसीएल की शुरूआत की गई थी। तब से लेकर अब तक भारत पेट्रोलियम लाखों लोगों के घर चलाने का सहारा बनी है।

एक लंबे सफर के बाद भारत पेट्रोलियम देश की दूसरी सबसे बड़ी पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस की कंपनी बनी और आज नरेंद्र मोदी की सरकार ने उसे बाजार में बिकने को रख दिया है।

इसके पहले ही एस्सार की हिस्सेदारी रूस के हाथों, रिलायंस की हिस्सेदारी ब्रिटिश कंपनी के हाथों और अडानी गैस फ्रांसिसी कंपनी के हाथों में है। बीपीसीएल भी अब इस कतार में शामिल हो जाएगी।

भारतीय शेयर मार्केट में 20 फीसदी विदेशी निवेशक हैं। निर्यात की प्रक्रिया भी निगेटिव में चल रही है।

मोदी सरकार ने पिछले 7 सालों के कार्यकाल एक भी बड़ी संस्था की नींव तक नहीं डाली है, लेकिन लगभग सभी राष्ट्रीय हित की संस्थाओं का निजीकरण जरूर कर दिया है।

इसके बाद भी हमारे आपके बीच कई ऐसे अंधभक्त हैं जो इतने बड़े पैमाने में हो रहे निजीकरण को भी किसी तरह प्रधानमंत्री मोदी का मास्टरस्ट्रोक ठहरा देंगे।

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