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अदनान अली

PM मोदी का चीन रिलेशन: सत्ता में आने के बाद अबतक चीन को पहुँचाया लाखों करोड़ का फायदा

भारत-चीन के सैनिकों के बीच 15 जून की रात लद्दाख की गलवान वैली में हुई हिंसक झड़प में 20 जवान शहीद हुए थे। इसके बाद से ही देश की सीमा पर स्तिथि तनावपूर्ण बनी हुई है उतनी ही देश के भीतर ही।

इस हादसे के बाद विपक्ष लगातार केंद्र सरकार से जवाब की मांग कर रहा है। जनता का भी मोदी सरकार पर कड़े कदम उठाने का दबाव बन रहा है।

दरअसल, सत्ता में आने के बाद से ही प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार ने अपनी छवि राष्ट्रवादी की बनाई है। उनके कई नेता अक्सर चीन के खिलाफ बयान देते हुए और ट्विटर पर लिखते हुए भी पाए जाते हैं।

लेकिन अब जनता चाहती है कि चीन के खिलाफ सरकार और उसके नेताओं की बाते भाषणों और सोशल मीडिया से आगे बढ़कर हकीकत का का अमली जामा पहनें। लेकिन क्या ये होना संभव है!

इसका अंदाज़ा लगाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद अबतक का विश्लेषण किया जा सकता है कि उन्होंने कि अपने कार्यकाल में चीन का भारत की ओर से कितना नुकसान किया है या लाभ पहुँचाया गया है।

चीन को वर्तमान में दुनिया की उभरती आर्थिक शक्ति के तौर पर देखा जा रहा है इसलिए उसको नुकसान भी उसी तरीके से पहुँचाया जा सकता है| विश्लेषण भी भारत और चीन के आर्थिक संबंधों का ही होना चाहिए।

व्यापार

सबसे पहले बात करते हैं व्यापर की। हर साल दिवाली पर भारतीय जनता पार्टी, उस से जुड़े संगठन और वैचारिक तौर पर उस से सहमती रखने वाले संगठन चीन के सामान को सड़क पर आग लगाकर अपना गुस्सा दिखाते हैं। लेकिन क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन लोगों के कार्यों को महत्व दिया है! आंकड़ें देखकर ऐसा नहीं लगता है।

वित्तीय वर्ष 2015-16 में भारत ने चीन से 4.43 लाख करोड़ रु. का सामान सालाना आयात किया था। ये आंकड़ा वर्ष 2019 में बढ़कर 6.18 लाख करोड़ रु. पहुँच गया। वित्तीय वर्ष 2016-17 में ये 4.6 लाख करोड़ था, 2017-18 में 5.6 लाख करोड़। अगर इन्हें जोड़ा जाए तो भारत ने चीन से लाखों करोड़ रुपए के उत्पाद लिए है। वर्ष 2016 से 2019 के बीच में ही चीन को भारत से 3.20 लाख करोड़ रु. का अतिरिक्त लाभ हुआ है।

सुरक्षा

चीन की मशहूर टेलिकॉम कंपनी हुआवै को पूरे विश्व में संदेह की नज़र से देखा जा रहा है। इस कंपनी पर आरोप है कि ये जिस भी देश में काम करती है वहां की आंतरिक जानकारी चुराती ही नहीं बल्कि उसे चीन की सरकार को देती भी है।

इन्ही आरोपों के चलते कई देशों ने हुआवै को प्रतिबंध कर दिया है। वर्ष 2019 में ही न्यूज़ीलैण्ड, जापान, नॉर्वे ने हुआवै को अपने देश में टेलिकॉम क्षेत्र में कार्य की अनुमति देने से मना कर दिया। स्वेडन ने भी हुआवै की जगह 5 जी नेटवर्क विकसित करने का कार्य किसी अन्य कंपनी को दे दिया। ब्रिटेन ने 5 जी नेटवर्क के विकास के लिए हुआवै की भूमिका को सीमित कर दिया है।

वहीं 2019 में ही मोदी सरकार ने राष्ट्रिय सुरक्षा को ताक पर रखते हुए हुआवै को भारत में टेलिकॉम क्षेत्र में बिना किसी सीमा के काम करने की अनुमति दी। ये फैसला इसलिए भी आचम्भित करने वाला था क्योंकि भारत के सभी करीबी देशों जापान, ऑस्ट्रिया और अमेरिका ने हुआवै पर आरोप लगाए हैं।

अवसर

प्रधानमंत्री मोदी की चीन पर महरबानियाँ यहीं ख़त्म नहीं होती हैं। मोदी सरकार ने हर क्षेत्र में चीन की कंपनियों को काम करने के अवसर दिए हैं। सरदार पटेल के नाम पर लौह पुरुष का नारा लगाने वाली मोदी सरकार ने उनकी मूर्ति यानि स्टेचू ऑफ यूनिटी का ठेका चीन की एक कंपनी को दिया। 522 फीट की इस मूर्ति को बनाने में 3000 करोड़ का खर्च आया था।

मोदी सरकार का यह फैसला उसकी अपनी ‘मेक इन इंडिया’ नीति और स्वयं सरदार पटेल के सिद्धांतों के खिलाफ था। सरदार खुद चीन के धुर विरोधी थे। 7 नवंबर, 1950 को अपने निधन के महज एक महीने पहले लिखे एक पत्र में उन्होंने नेहरु से कहा था “चीन से चाहे जितनी भी दोस्ती कर ली जाए लेकिन अंदर से वो हमें अपना दोस्त नहीं मानता और ना ही कभी मानेगा।”

संसदीय समीति की सिफारिश नज़रंदाज़

चीन और भारत के बीच जो व्यापार है वो कभी भी भारत के हक़ में नहीं रहा है। इस व्यापर में भारत हमेशा घाटे में रहा है। वर्ष 2019 में चीन से व्यापर करने में भारत को 56.77 बिलियन डॉलर का घाटा हुआ था। इसके अलावा भारत के उधमियों को भी इस से नुकसान होता रहा है क्योंकि चीन के सस्ते सामान के आगे उनका सामान बाज़ार में नहीं बिक पाता।

इसी सब के चलते जुलाई, 2018 में संसद की स्टैंडिंग समीति ने ये सिफारिश की थी कि चीन से आयात किये जाने वाले सामान पर “एंटी-डंपिंग शुल्क” लगाया जाए। ताकि भारत को हो रहे व्यापर घाटे को इस शुल्क से एडजस्ट किया जा सके और भारतीय उद्धामियों को भी इस से लाभ होगा। लेकिन मोदी सरकार ने संसदीय समीति की इस सिफारिश को नज़रंदाज़ करते हुए इस तरह का कोई कदम नहीं उठाया।

मोदी के करीबी चीन के निवेशक

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सत्ता में आते ही ‘मेक इन इंडिया’ का नारा दिया था। और हाल ही में उन्होंने ‘आत्मनिर्भर भारत’ का नारा दिया है। सरकार का कहना है कि उनकी इन नीतियों का उद्देश्य भारतियों द्वारा भारत में निवेश बढ़ाना है। लेकिन प्रधामंत्री मोदी के करीबी व्यवसायी खुद ही अपने देश को छोड़ चीन के निवेशक बने हुए हैं।

चीन में जिन भारतियों व्यवसायों ने बड़ा निवेश किया हुआ है उनमें से एक नाम प्रधानमंत्री मोदी के करीबी माने जाने वाले गौतम अडानी का है। अडानी ग्लोबल लिमिटेड ने चीन में बड़ा निवेश किया हुआ है। बता दें कि गौतम अडानी और पीएम मोदी के नज़दीकी रिश्ते उनके सत्ता में आने के बाद से लगातार चर्चा में रहे हैं।

मोदी सरकार का सोलर मिशन चीन के भरोसे

वर्ष 2015 में मोदी सरकार ने 2022 तक 1 लाख मेगावाट सोलर पावर उत्‍पादन क्षमता हासिल करने की महत्‍वाकांक्षी योजना प्रस्तावित की। लेकिन यह योजना भी मोदी सरकार ने चीन के भरोसे कर दी है। बता दें कि इस सोलर मिशन के लिए 84% उपकरण चीन से आयत किये गए|

इस लक्ष्य को समय पर प्राप्त करने के लिए वर्ष 2015-18 के बीच 35,580 करोड़ रुपए की बजटीय सहायता की जरूरत बताई गई थी। इस तरह बड़ी रकम का 84% चीन के खाते में गया है।

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