प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले साल संविधान दिवस के मौके पर कहा था- “अगर कोई पार्टी एक ही परिवार के ज़रिए कई पीढ़ियों तक चलाई जाती है, तो ये स्वस्थ लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है।” लगता है पीएम की ये सीख उन्हीं की पार्टी के लोगों को पसंद नहीं आ रही है। तभी तो उत्तर प्रदेश चुनाव के बहाने ‘परिवारवाद के विरोध का दिखावा करने वाली भाजपा’ का असली चरित्र सबके सामने आ गया है।

जैसे-जैसे चुनाव नज़दीक आ रहे हैं, वैसे-वैसे टिकट वितरण को लेकर पार्टी में विवाद बढ़ता जा रहा है। कुछ विवादों में तो एक ही परिवार के दो सदस्य आपस में भिड़ जा रहे हैं। उदहारण के तौर पर, लखनऊ की सरोजिनी नगर सीट से चुनाव में दयाशंकर सिंह और उनकी पत्नी स्वाति सिंह दावेदारी ठोक रहे हैं। यूँ तो स्वाति की अपने पति के कारण ही राजनीति में एंट्री हुई थी। लेकिन अब वो सरोजिनी नगर सीट से विधायक भी हैं और महिला कल्याण एवं बाल विकास राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) के पद पर भी। दयाशंकर उत्तर प्रदेश भाजपा में प्रदेश उपाध्यक्ष हैं। दोनों एक ही सीट से चुनाव लड़ना चाहते हैं। दोनों ने ही विधानसभा क्षेत्र में अपने पोस्टर लगवा दिए हैं। अब इंतज़ार है तो सिर्फ पार्टी की तरफ से ऐलान का।

भाजपा में परिवारवाद के अनेकानेक उदहारण हैं। उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य पर पिछड़ों की अनदेखी करने के साथ-साथ वंशवाद के आरोप भी लगते हैं। विपक्षी दलों में ‘स्टूल मंत्री’ के नाम से चर्चित केशव अपने बेटे योगेश मौर्य को चुनावी मैदान में उतारने की तैयारी में हैं।

केंद्रीय रक्षामंत्री राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह नॉएडा सीट से विधायक हैं। पंकज ने आगामी विधानसभा चुनाव के लिए नॉएडा से एक बार फिर नामांकन भी भरा है। राजनाथ सिंह ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत 13 साल की उम्र में वर्ष 1964 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़कर की थी। पिता के पदचिन्हों पर चलते हुए पंकज ने 2002 में राजनीति में कदम रखा। इस परिवार में सांसद और विधायक, दोनों हैं। अब प्रधानमंत्री मोदी के लिए ये परिवारवाद नहीं है, तो फिर क्या है?

भाजपा के ऐसे और भी नेता हैं जो अपने बच्चों को राजनीति में उतारने को आतुर हैं। ऐसा ही एक नाम है इलाहाबाद से भाजपा सांसद रीता बहुगुणा जोशी का। रीता चाहती हैं कि भाजपा उनके बेटे मयंक जोशी को लखनऊ की कैंट सीट से चुनाव लड़वाए। हाल ही में पार्टी में शामिल हुईं अपर्णा बिष्ट यादव भी इसी सीट से चुनाव लड़ना चाहती हैं।

दरअसल, रीता और अपर्णा ने एक दूसरे के खिलाफ इसी सीट से 2017 का विधानसभा चुनाव लड़ा था। फर्क सिर्फ इतना है कि तब अपर्णा भाजपा में नहीं थी। रीता ने चुनाव जीता और विधायक बनीं। उसके बाद रीता ने इलाहाबाद से 2019 लोकसभा चुनाव लड़ा और वहां से भी जीत दर्ज की। सांसद बनने के लिए उन्होंने विधायकी छोड़ दी और अब वही सीट अपने बेटे के लिए चाहती हैं। मीडिया के सवालों का जवाब देते हुए रीता बहुगुणा जोशी ने कहा कि वो अपने बेटे को टिकट दिलवाने का प्रयास नहीं कर रहीं, बल्की ये उनके बेटे का अधिकार है। यहां गलती से शायद रीता बहुगुणा जोशी परिवारवाद को अधिकार बोल गयीं। क्योंकि जिस तरह वो अपने बेटे के लिए पार्टी पर दबाव बना रही हैं, वो किसी अधिकार का हिस्सा तो नहीं है।

भाजपा छोड़ समाजवादी पार्टी में शामिल होने वाले कद्दावर नेता स्वामी प्रसाद मौर्य की भी कुछ ऐसी ही कहानी थी। मौर्य 2017 का विधानसभा चुनाव भाजपा की टिकट पर जीते थे। उन्हें यूपी सरकार में श्रम मंत्री भी बनाया गया था। उनकी बेटी संघमित्रा मौर्य यूपी की बदायूं सीट से भाजपा सांसद हैं। यूँ तो स्वामी प्रसाद मौर्य ने अब अपने पद से इस्तीफा दे दिया, लेकिन भाजपा में रहते हुए बाप और बेटी बड़े पद पर आसीन थे। संघमित्रा अभी भी भाजपा का दामन थामे हुए हैं।

ये तो प्रसिद्ध नेताओं के चंद उदाहरण हैं। परिवारवाद को लोकतंत्र के लिए खतरा बताने वाले प्रधानमंत्री के विचारों पर पार्टी विचार नहीं करती है। उल्टा पार्टी में परिवारवाद का बोल-बाला है। कांग्रेस और अन्य छोटे दलों पर वंशवाद का आरोप लगाने वाली भाजपा खुद इसी के मायाजाल में उलझी हुई है।

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