भारत में बेरोजगारी, गरीबी, भूख जैसे मुद्दे अब भी कायम हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार में तो इन्हें और भी बल मिल गया है, क्योंकि इनके राज में देश के अंदर आर्थिक असमानता बढ़ती जा रही है। ”वर्ल्ड इनइक्वलिटी रिपोर्ट 2022” के अनुसार भारत का नाम उन देशों की लिस्ट में शामिल है जिनमें सबसे ज़्यादा आर्थिक असमानता पायी जाती है। यहाँ पर गरीब और समृद्ध लोगों के बीच की खाई बढ़ती ही जा रही है।

मशहूर अर्थशास्त्रियों द्वारा ऑथर की गई इस रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में सबसे संपन्न 1 प्रतिशत लोग देश की 22 प्रतिशत आमदनी कमाते हैं। वहीं दूसरी तरफ कुल आबादी के आधे लोगों (50%) मात्र 13 प्रतिशत आमदनी कमाते हैं।

दरअसल, भारत की व्यस्क जनसंख्या की औसत आय 2,04,200 रूपए है। देश की आधी आबादी 53,610 रूपए कमाती है जबकि शीर्ष 10 प्रतिशत आबादी इसका 20 गुना यानी 11,66,520 रूपए कमाती है। इन्हीं 10 प्रतिशत लोगों की आमदनी देश की कुल आमदनी का 57 प्रतिशत है।

इस असमानता की एक वजह पूंजीवाद है। भारत में जब अर्थव्यवस्था पर सरकार ने सीधे तौर पर नियंत्रण करना कम कर दिया, तब देश में निजी संपत्ति तेज़ी से बढ़ी। रिपोर्ट के अनुसार निजी संपत्ति 1980 में 290% से बढ़कर 2020 में 560% हो गई।

ज्यादातर देशों की तरह भारत में भी लिंग के आधार पर भेद-भाव होता है। यही वजह है कि किसी भी बढ़ती असमानता का असर महिलाओं पर अधिक होता है। एक तरफ एशिया (चीन को छोड़कर) में श्रमिकों की आय में महिलाओं की भागेदारी 21 फीसदी है, तो वहीं भारत में ये आंकड़ा महज़ 18 फीसदी है। ठीक इसी तरह देश में सामाजिक असमानता के चलते दलितों और पिछड़ों पर भी आर्थिक असामनता की मार अधिक पड़ती है।

यक़ीनन, प्रधानमंत्री मोदी के ‘न्यू इंडिया’ में बढ़ती असमानताओं ने गरीबों और अमीरों, पुरषों और महिलाओं, अगड़ों और पिछड़ों के बीच एक बड़ी खाई बना दी है। यहाँ पर ‘सबका साथ-साबका विकास’ होता नहीं दिख रहा है।

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