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अमरोहा लोकसभा सीट के लिए 18 अप्रैल को चुनाव होना है। इस सीट पर फिलहाल बीजेपी का कब्ज़ा है। लेकिन इस बार बीजेपी के सामने महागठबंधन एक बड़ी चुनौती के रूप में खड़ा नज़र आ रहा है।

मुस्लिम बहुल इस सीट पर महागठबंधन की ओर से बीएसपी प्रत्याशी दानिश अली चुनाव मैदान में हैं। जो बीजेपी प्रत्याशी एवं मौजूदा सांसद कंवर सिंह तंवर को कड़ी टक्कर देते दिखाई दे रहे हैं। वैसे तो इस सीट के लिए 15 उम्मीदवार चुनावी मैदान में हैं, लेकिन बीजेपी और गठबंधन प्रत्याशी के अलावा यहां कांग्रेस के उम्मीदवार सचिन चौधरी पर ही सबकी नज़र टिकी है।

2014 में भले ही यह सीट बीजेपी के खाते में गई हो, लेकिन 2019 में सपा-बसपा के साथ आने के बाद इस सीट पर बीजेपी की जीत काफी मुश्किल नज़र नज़र आ रही है। राजनीतिक जानकारों की मानें तो मुस्लिम बहुल इस सीट पर 2014 में मुस्लिम वोटर्स सपा-बसपा में बंट गए थे। जिसका सीधा फायदा बीजेपी को मिला। लेकिन इस बार सपा-बसपा साथ हैं तो बीजेपी की राह आसान नहीं।

इसके अलावा 2014 में बीजेपी इस सीट पर जाट वोटरों को साधने में भी कामयाब हुई थी। लेकिन इस बार जाटों की पार्टी कही जाने वाली रालोद भी गठबंधन में शामिल है और कांग्रेस प्रत्याशी सचिन चौधरी भी जाट समाज से आते हैं, ऐसे में बीजेपी को जाटों के ज़्यादा वोट मिलते नज़र नहीं आ रहे हैं।

मुस्लिम वोटरों के न बंटने और जाट वोटरों का समर्थन पा जाने की स्थिति में महागठबंधन उम्मीदवार कुंवर दानिश अली की जीत की दावेदारी बढ़ जाती है।

इसके साथ ही अगर बीजेपी प्रत्याशी और मौजूदा सांसद कंवर सिंह तंवर की बात करें तो यहां के लोग उनसे ख़ुश नहीं हैं। तंवर से नाराज़गी की वजह उनकी जनता से दूरी और जिस गुर्जर समाज से वह आते हैं, उसे बीजेपी में सम्मान न मिलना बताया जा रहा है।

16,33,188 वाली इस सीट पर 2014 के चुनाव में कंवर सिंह तंवर ने 48.3 फीसद यानी 528,880 वोट पाकर जीत दर्ज की थी। वहीं समाजवादी पार्टी की हुमैरा अख्तर 33.8 फीयद यानी 370,666 वोटों के साथ दूसरे स्थान पर थीं। इसके साथ ही तीसरे स्थान पर रहे बीएसपी उम्मीदवार फरहत हसन को कुल 162,983, 14.9% वोट मिले थे।

दुनिया को जौन एलिया जैसा शायर देने वाली अमरोहा लोकसभा सीट पश्चिमी उत्तर प्रदेश की इकलौती ऐसी सीट है जहां के वोटरों ने वामपंथियों से लेकर निर्दलीय उम्मीदवार तक को गले लगाया और उन्हें यहां से चुनकर लोकतंत्र का हिस्सेदार बनाया।

यहां के वोटरों ने दो बार इस सीट से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के इशाक सम्भली को जिताकर संसद भेजा तो निर्दलीय हरीश नागपाल को भी देश की संसद में जनता की बात रखने का मौका दिया। बाद में हरीश के भाई देवेंद्र नागपाल भी राष्ट्रीय लोकदल के टिकट से यह सीट जीते। बसपा नेता राशिद अल्वी भी यहां से सांसद रह चुके हैं।

पहली लोकसभा के लिए हुए चुनाव में इस सीट से जीतने वाले हिफुजुर्रहमान भी मंडल के इकलौते ऐसे जनप्रतिनिधि रहे जिन्होंने किसी एक ही सीट से जीत की हैट्रिक लगाई। इस बार भी इस सीट पर काफी दिलचस्प मुकाबला होने की उम्मीद है।