भले ही केंद्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी के तमाम नेता बार-बार इस बात का दावा कर रहे हैं कि कोरोना वैक्सीन आ गई है और सभी देशवासियों को उसपर पूरा भरोसा है मगर इन दावों के उलट वैक्सीन पर तरह-तरह के सवाल उठ रहे हैं।

जहां उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव समेत तमाम राजनेताओं ने इसे चुनावी वैक्सीन घोषित किया है और सरकार की मंशा पर सवाल उठाया है वहीं तमाम सामाजिक कार्यकर्ता भी कोरोना वैक्सीन को अभी संदिग्ध मान रहे हैं।

इसी मामले पर विस्तार से पड़ताल करने के लिए आरटीआई एक्टिविस्ट साकेत गोखले ने एक आरटीआई डाला था ताकि सरकार से मिले जवाब के आधार पर विश्वसनीयता का अंदाजा लगाया जा सके।

उन्होंने मोदी सरकार से सवाल किया था कि ‘भारत बायोटेक की जिस को-वैक्सीन को अप्रूव किया गया है उसका क्लिनिकल ट्रायल कब और कैसे हुआ? ये कितना सुरक्षित रहा और कितना कारगर रहा?

इसका डाटा दीजिए। सरकार ने आरटीआई में जानकारी देने से इंकार कर दिया और कहा कि ये बात बता देने से भारत बायोटेक की ‘प्रतिद्वंदिता को नुकसान होगा।’

 

इस पूरे वाक्य को ट्वीट करते हुए साकेत गोखले हैरानी और नाराजगी व्यक्त करते हैं।

सरकार द्वारा दिए गए जवाब पर सवाल इसलिए भी उठता है कि जिस टीके को करोड़ों आम आदमी को लगाया जाना है वो कितना साफ सुरक्षित और कारगर है, जानने का हक क्यों नहीं है!

और दूसरी बात कि सरकार ने इसे किसी मेडिकल या सुरक्षा के मद्देनजर इनकार नहीं किया है बल्कि भारत बायोटेक को कंपटीशन में बेजोड़ बनाए रखने के लिए इनकार किया है।

जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि लोगों के स्वास्थ्य और जिंदगी से कहीं ज्यादा है इस देश की सरकार को सहयोगी कंपनियों की फिक्र होती है।

वैसे तो बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं मगर मीडिया में आ रहे तमाम रिपोर्ट्स के मुताबिक बीजेपी के अधिकतर बड़े नेता खुद वैक्सीन लगाने से आनाकानी कर रहे हैं और कह रहे हैं कि बाद में लगाएंगे

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