kannan gopinathan
Kannan Gopinathan

नागरिकता संशोधन विधेयक (CAB) को लेकर भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में बवाल की स्थिति है। छात्र संगठनों से लेकर आमजन तक इस बिल के ख़िलाफ़ सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन कर रहे हैं। असम के नागरिक इस बिल का विरोध इसलिए कर रहे हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि इस नियम से उनकी पहचान, भाषा और संस्कृति खतरे में पड़ जाएगी।

विपक्षी नेताओं से लेकर देश की कई जानी मानी हस्तियां भी इस बिल का विरोध कर रहे हैं। इन सभी लोगों का मानना है कि ये बिल मुस्लिम विरोधी है, इस बिल का उद्देश्य मुसलमानों को निशाना बनाना है। लेकिन इस बिल को जिन मुसलमानों के खिलाफ़ बताया जा रहा है, वह इसके खिलाफ़ कोई प्रदर्शन करते नज़र नहीं आ रहे। वह इस मुद्दे पर पूरी तरह से ख़ामोश हैं।

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किसी भी मुस्लिम संस्था की तरफ से अभी तक बिल के खिलाफ़ किसी तरह के प्रदर्शन का कोई आह्वान नहीं किया गया है। ऐसा माना जा रहा है कि मुसलमानों की इस खामोशी की वजह उनका डर है। मुसलमानों को लगता है कि अगर वह इसके ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ उठाएंगे तो सरकार के निशाने पर आ जाएंगे। सरकार उनके खिलाफ़ कार्रवाई करेगी। लेकिन सवाल यही है कि मुसलमानों को ये डर क्यों है?

क्या मुसलमानों को सरकार की उन नीतियों पर सवाल खड़े करने का हक़ नहीं है जो उन्हें निशाना बनाने के लिए लाई गई हैं? भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी कनन गोपीनाथन ने कहा है कि जिस तरह सभी लोगों को सरकार की उन नीतियों का विरोध करने का हक़ है, जो उनके खिलाफ़ हैं। उसी तरह मुसलमानों को भी होना चाहिए।

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उन्होंने ट्विटर के ज़रिए कहा, “अगर सरकार की नीति किसान को प्रभावित करती हैं तो वे विरोध करने के लिए बाहर आते हैं। अगर सरकार की नीति आदिवासियों को प्रभावित करती हैं तो वो विरोध करते हैं। इसी तरह जब सरकार की नीति मुसलमानों को निशाना बनाती है तो उन्हें भी विरोध करने का पूरा अधिकार है”।

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