महेश चौधरी

ये किसान हैं साहेब, धरती का सीना फाड़कर अन्न उगाते हैं। आपकी ये दलाली और बिकवाली यहाँ नहीं चलेगी।

राज्यसभा मे जिस तरह खेती-किसानी से जुड़े तीन अध्यादेश ‘ध्वनि-मत’ या यूँ कहें की विरोध मे गूँज रही ध्वनि के बीच ‘स्व-मत’ से पारित किए गए उसे भारत के संसदीय लोकतंत्र के गहरे काले अध्याय के रूप मे ही याद किया जाएगा। इन अध्यादेशों पर चली संसद की कार्यवाही को देखिए और पहचानने की कोशिश करिए की कौन किसानों की आवाज़ बने और कौन पूँजीपतियों और कोरपोरेट के दलाल।

तीनों अध्यादेशों में झोल कितना हैं ये अब किसी से छुपा नहीं हैं, आप किसी भी ग़ैर दरबारी और गैर गोदी मीडिया श्रोत से जान सकते हैं। किसान जहाँ इनका पुरज़ोर विरोध कर रहे हैं वहीं देश का प्रधानमंत्री कह रहें हैं की उनको भ्रमित किया जा रहा हैं। अरे भाई एक बार को अगर मान लें की भ्रमित ही किया जा रहा था तो पहले उनका भ्रम दूर कर देते, पता होते हुए की किसान विरोध में हैं फिर भी ऐसे चोरी से चोरों की तरह बिल पास क्यों करवा लिए? अचानक इतनी ज़ोर की किसान हितैषी बनने की क्यों आयी आपको? मैं बताता हूँ की क्यों आयी।

बात ये है कि देश-बेचो योजना के तहत अब जब सरकार लगभग सारी चीज़ें बेच चुकी हैं तो जीडीपी के -24 तक गिरने पर भी 3/4 फ़ीसदी बढ़त हासिल कर रहे कृषि-क्षेत्र पर गयी। अब पूँजीपति और सत्ता में बैठे उनके दलाल भला कैसे इसे नज़र अन्दाज़ कर सकते थे।

ठीक से देखा तो किसानों के ख़ून-पसीने की मेहनत की कमाई तो दिखी ही साथ में दिखी उनकी बेशक़ीमती ज़मीनें। ऊपर से धीरे-धीरे पिछले दरवाज़े से एमएसपी यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं देने का विकल्प भी नज़र आ गया। अब हर मोर्चे पर विफल होती सरकार को क्या चाहिए था, सोचा की किसान तो भोले हैं और उनकी नयी पौध यानी किसान-पुत्र हमारे नए-भारत, हिंदू-राष्ट्र, श्रेष्ठ-भारत और तमाम ऐसे नशे जो इस पूँजीवाद के पिट्ठु सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ने दे रखे हैं उसके सुरुर में मदहोश हैं ही। ऐसे में आराम से शब्दों का फेर-बदल करके और उनको चाशनी में डालकर परोस देंगे। वो दे देंगे सब राज़ी-राज़ी और बिना कुछ बोले, अगर बोलेंगे तो हमारे गोदी मीडिया से लेकर मैडम कंगना तक से विशेषज्ञ समर्थन दिलवा देंगे। लेकिन भूल गए की काठ की हांडी एक बार चढ़कर जल चुकी है।

ख़ैर विरोध हुआ, सारे मोर्चे भी खुले और प्रधानमंत्री सहित पूँजीवादियों के सारे पिट्ठुओ ने कोई तर्क नहीं बचने पर कहा की ये तो देखो की विरोध कौन कर रहा है, ये तो सारे कांग्रेसी, वामपंथी और विपक्षी दलों वाले हैं। हालाँकि हम कहने के लिए सरकार में शामिल अकाली दल और बीजेपी/आरएसएस के भारतीय किसान संघ के दिखावटी विरोध का उदाहरण भी दे सकते हैं लेकिन उसको रहने भी दे तो कोई ये बताए की संसदीय लोकतंत्र में सरकार की नीतियों का विरोध विपक्ष नहीं करेगा तो कौन करेगा?

अध्यादेश तो वापिस लेने ही पड़ेंगे लेकिन मोदी जी और उनके समर्थकों से सिर्फ़ यही अपील हैं अपने कुकर्मों और कुतर्कों को कांग्रेस, वामपंथ और विपक्षी दलों के नाम पर सही ठहराना बंद करें, ये निजीकरण बंद करें और जनता को मूर्ख समझना भी बंद कर दें। ये किसान हैं साहेब, धरती का सीना फाड़कर अन्न उगाते हैं। आपकी ये दलाली और बिकवाली यहाँ नहीं चलेगी।

( महेश चौधरी एक स्वतंत्र पत्रकार हैं। लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी अध्ययन और अनुभव पर आधारित हैं।)

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