नोटबंदी मौजूदा सरकार की नीति नियामक प्रतिभा का चरम थी, जिसने भारतीय अर्थव्यवस्था की तबाही की प​टकथा लिखी. नोटबंदी में सैकड़ोंं बार नियम बदले गए, अराजकता पैदा की गई. नतीजा यह हुआ कि कोरोना से काफी पहले ही विकास दर लगभग शून्य पर आ गई. पांच साल में करीब चार करोड़ लोग बेरोजगार हो गए.

हर नीति, हर योजना में इस सरकार का प्रदर्शन ऐसा ही रहा. अब कोरोना को ले लीजिए.

500 केस पर लॉकडाउन, सवा लाख केस पर ढील. कभी कोरंटाइन 14 दिन, कभी सात दिन, कभी 21 दिन. बोले ट्रेन चलाएंगे. फिर बोले नहीं चलाएंगे. फिर बोले सीमित चलाएंंगे. फिर कहा कि टिकट आनलाइन मिलेगा, फिर 24 घंटा में काउंटर खोल दिया. अब कह रहे हैं कि ट्रेन और हवाई यात्रा सब खुलेगी.

पहले बोले मजदूर जहां हैं वहीं रहें, राशन पानी पहुंचेगा. ​नहीं पहुंचा, लोग भागने लगे. छिटपुट आदेश हुआ कि लोगों को सुरक्षित घर पहुंचाया जाए. लेकिन नहीं पहुंचाया गया. गिट्टी भरे ट्रक में, सीमेंंट मिक्सर में लदकर, पैदल चलकर लोग अपने घर जाते रहे. पैदल चलकर कितने मरे, कोई पता नहींं, लेकिन कांग्रेस ने बसें चलाईं तो नियम कानून पढ़ाने लगे.

दुुनिया का चौथा सबसे बड़ा रेलवे और यूपी परिवहन का सबसे बड़ा बसों का बेड़ा खड़ा खड़ा अंंडे देता रहा. वह मरते हुए लोगों के भी काम न आया.

दो महीना हो गया है. पलायन अब भी जारी है. मीडिया में खबरें आनी कम हो गई हैं. लेकिन किसी सरकार ने कोई स्पष्ट नीति नहींं बनाई है. लोगों को पहुंचाने से लेकर उनकी जांच करने या कोंंरटाइन करने तक, कुछ भी स्पष्ट नहींं है.

देश का विकास जनता करती है. सरकार इस काम में जनता की मदद करती है. यह सरकार जनता और देश की राह में बाधा है. कोई दुरदर्शिता नहीं, कोई योजना नहीं, कोई प्रशासनिक कौशल नहीं. क्योंकि चाहे केंद्र हो या राज्य, बीजेपी सरकारों की निर्भरता पूरी तरह अधिकारियों पर है. अधिकारी नियमों, कानूनों और नेताओं की तानाशाही के चलते खुलकर अपना प्रदर्शन नहीं करते, बस अपनी गर्दन बचाते हैं. नतीजा आपके सामने है.

इसीलिए नेता का दूरदर्शी होना जरूरी है, गुंडा, बवाली, अपराधी, संहारकर्ता, दंगाई, धुर्त और झुट्ठा न हो तो भी चलेगा.

  • कृष्णकांत

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here