21वीं सदी में भी जातिवाद का ज़हर किस तरह लोगों में मौजूद है इसका एक बार फिर से उदाहरण देखने को मिला है – मध्य प्रदेश के गुना में। जहां एक व्यक्ति का दाह संस्कार शमशान के चबूतरे पर सिर्फ इसलिए नहीं करने दिया गया क्योंकि वो दलित समाज से था। जातिवादी भेदभाव की ये वीडियो सामने आने के बाद सामाजिक कार्यकर्ता सूरज कुमार बौद्ध ने ट्विटर पर घटना को कोट करते हुए लिखा : “तुम छोटी जाति के हो। श्मशान घाट के चबूतरे पर शव को मत जलाओ। नीचे जमीन पर ही जलाओ।” (मध्य प्रदेश के गुना का मामला)

सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होने के बाद पुलिस प्रशासन हरकत में आई और 3 जातिवादी गुंडों को गिरफ्तार भी कर लिया गया। हालांकि भले ही इस मामले में गुंडागर्दी करने वाले लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया मगर समाज में व्याप्त जातिवाद की वजह से ये आखिरी घटना तो नहीं ही होगी। ऐसी घटनाएं रोज हो रही हैं और ना जाने कब तक होती रहेंगी।

इसी पर प्रतिक्रिया देते हुए दिल्ली सरकार के समाज कल्याण और महिला एवं बाल विकास मंत्री राजेंद्र पाल गौतम ने लिखा: “मुझे लगता है कि अब भारत सरकार को इस तरह के मामले माननीय सर्वोच्च न्यायालय को विचार हेतु भेजने चाहिए कि हमारे दलित,पिछड़े व आदिवासी समाज के लोग अपने ही देश में आखिर जानवर से बदत्तर जीवन जीने व मरने के बाद भी जातीय उत्पीड़न के शिकार क्यों है ? हम इन्सान भी हैं या नहीं ?”

ऐसे मामलों को सर्वोच्च न्यायालय में ले जाने के पीछे मंत्री राजेंद्र पाल गौतम का तर्क है कि दलित, पिछड़े, आदिवासी समाज के लोग लंबे समय से ऐसी प्रथाओं की वजह से जानवरों से भी बदतर जिंदगी जीने को मजबूर है। इसलिए अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा ही ठोस कदम के जरिए किसी बड़े बदलाव की उम्मीद की जा सकती है।

गौरतलब है कि दलितों के शव के साथ भेदभाव की ये कोई पहली घटना नहीं है। इससे पहले भी देशभर से खबरें आती रही हैं कि दलित समाज के किसी व्यक्ति का शव ले जाते समय तमाम जातिवादी लोग रास्ते बंद कर दिया करते हैं। अंतिम संस्कार करने जा रहे दलितों की राह में बाधा पैदा करते हैं।

ये समझना मुश्किल है कि आज भी दलितों से इतनी नफरत क्यों की जाती है कि शव से भी दुर्व्यवहार किया जाता है। मगर फिर भी ये उम्मीद की जा रही है कि जल्द ही सख्त कानूनों और सामाजिक आंदोलनों के जरिए ऐसी अमानवीय हरकतों पर रोक लगेगी।

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