अयोध्या में शिवसेना और विश्व हिंदू परिषद की हलचल को देखते हुए भारतीय जनता पार्टी सतर्क हो गई है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को ये डर सताए जा रहा था कि कहीं हिंदुओं का सपोर्ट दूसरी तरफ शिफ्ट ना हो जाए , आनन-फानन में उन्होंने ऐलान कर दिया कि वह श्रीराम की सबसे ऊंची प्रतिमा लगाएंगे, जिसकी ऊंचाई 221 मीटर प्रस्तावित है। यानी सरदार पटेल की प्रतिमा से भी कहीं ऊंची।

सबसे ऊंची प्रतिमा बनवाने के ऐलान में कुछ भी गर्व करने जैसा दिखाई नहीं देता बल्कि तमाम सवाल उठते हैं कि अपराध से त्रस्त यूपी को योगी के कथित रामराज्य की जरूरत थी या फिर राम की मूर्ति की ?

चारों तरफ कुशासन और अव्यवस्था फैली हुई है और हजारों करोड़ की पत्थर की मूरत बनवा कर बीजेपी की सरकार क्या पाना चाहती है ? अगर मूर्ति बनाना इतनी ही बड़ी बात होती है तो अपने चुनावी घोषणापत्र में वह राम की मूर्ति बनवाने की बात क्यों नहीं करते ? क्यों कहते हैं कि रामराज्य लेकर आएंगे ?

अगर रामराज्य को गुड गवर्नेंस का प्रतीक बताकर वोट लेते हैं तो गवर्नेंस पर फोकस करने के बजाय फिजूलखर्ची पर क्यों ध्यान देते हैं ?

यह वही भाजपा है जो 2007 से 2012 तक चली मायावती की सरकार को दिन-रात सिर्फ इसलिए कोस रही थी क्योंकि उन्होंने करोड़ों रुपए लगाकर अंबेडकर पार्क बनवाए।

वंचित समाज के लोग अपना इतिहास सहेजें, मूर्तियां बनवाएं तो बुरे हो गए और धर्म की राजनीति को हवा देने के लिए योगी राम की मूर्ति बनाए तो क्या ?

अभी हाल ही में गुजरात में सरदार पटेल की ऊंची मूर्ति के उद्घाटन समारोह की भव्यता ऐसे प्रचारित प्रसारित की गई जैसे कि पूरे देश की सारी समस्या उसी मूर्ति से खत्म हो जाएगी.। अब यही राजनीति यूपी में भी अपनाने की कोशिश की जा रही है कि भगवान राम की सबसे ऊंची मूर्ति बनाई जा रही है।

पत्थर की प्रतिमाओं से प्रदेशवासियों की भावनाओं के साथ कब तक खिलवाड़ होता रहेगा ! क्या मूर्तियों में हजारों करोड़ खर्च कर देने से प्रदेश की बेरोजगारी, अशिक्षा, अव्यवस्था और अपराध खत्म हो जाएंगे?

अगर नहीं तो फिर फिजूलखर्ची क्यों ?

अगर सरकार मूर्तियां बनवाने को फिजूलखर्ची नहीं मानती तो अपने चुनावी वादों में गवर्नेंस का वादा ना करके मूर्तियां बनवाने का वादा करके देखे, जनता फिर से इस भाजपा को प्रदेश में तीसरे या चौथे नंबर की पार्टी बना देगी।

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