देश में मानो बच्चों की जान की कीमत का कोई मोल नहीं है। चाहे गोरखपुर हो, बिहार हो या सूरत हो यहां बच्चे इसीलिए मरे/मर रहे हैं, क्योंकि सरकार ने ठीक से काम नहीं किया. सरकारें तमाम सरकारी योजनाओं में इन्हीं बच्चों के माँ-बाप के टैक्स का पैसा झोंक देती हैं। मगर ये योजनाएं उनतक पहुँच नहीं पातीं! सरकारें योजनाएं बनाने में लगी रहती हैं लेकिन वो असल बीमारी, मसलन टीकाकरण, दवाई, अस्पताल, डॉक्टर्स जैसी सुविधाओं को नजरअंदाज कर देती हैं।

दरअसल इस देश का सिस्टम इतना ख़राब है कि सरकारें इस ओर ध्यान नहीं देतीं और लोग ऐसे हैं कि उनको इन सभी मूलभूत सुविधाओं का न मिलने से उनको कोई फर्क भी नहीं पड़ता। क्योंकि चुनाव में जनता को राष्ट्रवाद, पाकिस्तान, हिन्दू-मुस्लिम और मंदिर ही चाहिए होता है। जनता भी अपनी नाकारा सरकारों से स्वास्थ्य, शिक्षा पर सवाल नहीं पूछती!

यही वजह है कि पिछले साल गोरखपुर के बीआरडी अस्पताल में सकड़ों नन्हे बच्चे ऑक्सीजन की कमी के चलते मर गए। जब अस्पताल से पूछा गया कि ऑक्सीजन क्यों नहीं थी तो जवाब आया ऑक्सीजन के लिए पैसे नहीं थे!

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ऑक्सीजन सप्लाई करने वाली कंपनी को 70 लाख रुपये देने के लिए एक सरकारी अस्पताल के पास पैसे नहीं थे। इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि योगी सरकार ने कभी इस ओर ध्यान ही नहीं दिया कि लोगों के स्वास्थ्य का भी ख्याल रखना होता है। बल्कि उन्होंने गायों के लिए बाड़े बनाने और चारे के लिए जरुर झट से बजट जारी कर दिया। लेकिन अस्पताल को पैसे देने के लिए नहीं थे।

यही हाल बिहार के SKMCH अस्पताल का है। मुजफ़्फ़रपुर के इस अस्पताल में एक्यूट इंसेफ्लाइटिस सिंड्रोम (AES) यानि चमकी बुखार से अबतक मरने वाले बच्चों की संख्या 144 के पार पहुँच चुकी है। लेकिन शासन-प्रशासन आँखें बंद करके गहरी नींद में है। मुजफ़्फ़रपुर के इस अस्पताल में डॉक्टर्स की कमी है। पर्याप्त दवाइयां नहीं हैं, ICU में बच्चों को लिटाने के लिए बेड नहीं हैं।

इसके बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को दिल्ली से फुर्सत मिली तो बैठक करने पहुंच गए। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री को वर्ल्ड कप में गिरने वाले विकेट की चिंता है। प्रधानमंत्री खामोशी से लोकसभा में नजर आ रहे हैँ। उन्हें ना ट्विटर पर मासूमों की मौत पर दुख साझा करने फुर्सत की है ना अपने भाषणों में।

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वहीं इसके उलट गुजरात के सूरत में एक कोचिंग सेंटर में आग लगती है, जिसमें तकरीबन 23 बच्चे झुलस कर मर जाते हैं, लेकिन जब फायर ब्रिगेड की गाड़ी आग बुझाने घटना स्थल पर पहुंचती है तो उसके पास आग लगी जगह पर पानी की सटीक बौछार मारने के लिए सीढ़ी नहीं थी! यही नहीं इन बच्चों के शवों को कंधा देने गुजरात सरकार का कोई मंत्री या बड़ा नेता नहीं पहुंचता।

मुख्यमंत्री हादसे के बाद घायल बच्चों से मिलने अस्पताल तो पहुंचते हैं और मृतकों के परिजनों को 4 लाख रुपए का मुआवज़ा देने का ऐलान भी करते हैं। लेकिन मृतकों के परिजनों से मिलने उनके घर नहीं पहुंचते न ही उनका कोई मंत्री मृतकों के परिवार वालों से मिलता है। सरकार की इस बेरुखी से समझा जा सकता है कि वो किस हद तक नाकारा है। यानि सिस्टम को दुरुस्त करने के बजाए सरकारें मुआवजा से कम चला लेती हैं।