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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली सेलेक्टिव कमेटी द्वारा 10 जनवरी को सीबीआई निदेशक पद से हटाए जाने के बाद आलोक वर्मा ने अपनी चुप्पी तोड़ी है। वर्मा ने आज कहा है कि, झूठे, बेहद कमज़ोर और आप्रमाणिक इल्ज़ाम लगाकर मुझपर कार्रवाई की गई। ये इल्ज़ाम ऐसे शख़्स ने लगाए हैं जो मुझसे बैर रखता है

आलोक वर्मा यहीं नहीं रुके उन्होंने आगे कहा, “सीबीआई की स्वतंत्रता सुनिश्चित होनी चाहिए। ताकि उस पर किसी बाहरी शक्ति का दबाव न हो। मैं संस्था की अखंडता बनाए रखने की कोशिश की। जबकि इसको बर्बाद करने की कोशिश की जा रही।”

ग़ौरतलब कि राकेश वर्मा सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर 3 दिन पहले ही दोबारा सीबीआई चीफ़ नियुक्त हुए थे। तभी से ये कयास लगाए जा रहे थे कि मोदी सरकार उन्हें जल्द ही हटा सकती है। क्यों कि वर्मा राफ़ेल जाँच की ओर रुख़ कर सकते हैं, और ऐसा हुआ भी। वर्मा को सीबीआई चीफ़ जैसे अहम पद से हटाकर फ़ायर सर्विसेस, होमगार्ड विभाग और सिविल डिफ़ेंस का महानिदेशक बनाया गया है।

क्या था मामला-

सीबीआई डायरेक्टर आलोक वर्मा और उनके बाद नं. 2 की हैसियत रखने वाले मोदी के क़रीबी राकेश अस्थाना के बीच भ्रष्टाचार के आरोप-प्रत्यारोप के बीच सरकार ने दोनों की शक्तियाँ लेकर उन्हें छुट्टी पर भेज दिया था। आलोक वर्मा ने सरकार के फ़ैसले के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दी। जिस पर फ़ैसला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आलोक वर्मा को 77 दिन बाद दोबारा सीबीआई चीफ़ नियुक्त कर दिया। साथ ही मोदी सरकार को फटकार भी लगाई।

वापस आते ही एक्शन दिखाने लगे थे वर्मा-

सुप्रीम कोर्ट से दोबारा सीबीआई निदेशक पद पर बहाली मिलने के बाद आलोक वर्मा पूरे फ़ॉर्म में चल रहे थे। 77 दिन बाद सीबीआई मुख्यालय पहुँचे सीबीआई चीफ़ ने उनकी ग़ैरमौजूदगी में किए गए सारे ट्रांसफ़र कैंसल कर दिए थे। ये सारे ट्रांसफ़र ऑर्डर एम नागेश्वर राव ने दिए थे। जो वर्मा की ग़ैरमौजूदगी में सीबीआई के अंतरिम निदेशक बनाए गए थे।

सीबीआई चीफ़ ने 10 जनवरी को अपने ऑफ़िस के दूसरे दिन ताबड़तोड़ पाँच अधिकारियों के तबादले भी किए थे।

जिन अधिकारियों के तबादले को वर्मा ने रोका था उनमें वो अधिकारी भी शामिल थे जो मोदी सरकार के क़रीबी माने जाने वाले राकेश आस्थाना के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के आरोपों की जाँच कर रहे थे।

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