उत्तर प्रदेश में बड़े नेताओं की जनसभाओं का सिलसिला जो त्योहारों के चलते हफ्ते भर से रुका हुआ था, उसे फिर से रफ्तार मिल रही है। इसकी आहट अंबेडकर नगर से सुनी जा सकती है, जहां अखिलेश यादव के नेतृत्व में जनादेश महारैली का आयोजन हुआ।

अखिलेश यादव ने इस महारैली में भाजपा सरकार की तमाम नीतियों पर सवाल उठाए और योगी सरकार को नाकाम बताया मगर इस महारैली की सबसे अहम बात रही कि अखिलेश यादव ने खुलकर पिछड़ा कार्ड खेला है। उन्होंने अपने भाषण की शुरुआत में ही कहा-“इस बार पिछड़ों का इंकलाब होगा, 2022 में बदलाव होगा”

उनके इस नारे की कई वजहें हैं, जैसे मंच पर उपस्थित तमाम ओबीसी समाज के नेता, भीड़ में उपस्थित ओबीसी समाज की एक बहुत बड़ी आबादी, और पूरे उत्तर प्रदेश की आधी से ज्यादा आबादी।

दरअसल तमाम ओबीसी जातियों को समाजवादी पार्टी के खिलाफ करने के लिए भाजपा ने यादवों के खिलाफ तमाम दुष्प्रचार चलाए और अब जब अखिलेश यादव खुलकर ओबीसी कार्ड खेल रहे हैं तब भाजपा के उसी जनाधार के खिसक जाने की आशंका जताई जा रही है। अंबेडकरनगर में मंच पर से जिस तरह अखिलेश यादव ने ओबीसी के इंकलाबी होने की बात की उससे कुछ महीने पहले उनके उस भाषण को याद किया जा रहा है जो संसद के अंदर उन्होंने दिया था। जब ओबीसी के अधिकारों के संदर्भ में बोलते हुए उन्होंने पिछड़े पावैं 100 में 60 के नारे को बुलंद किया था।

इसमें कोई दो राय नहीं कि समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अगर ओबीसी समाज को अपने साथ और भाजपा के खिलाफ करने में सफल रहे तो प्रदेश की सत्ता पर काबिज हो सकते हैं। इस समाज की आबादी इतनी ज्यादा है कि इसपर पकड़ रखने वाला कोई भी नेता प्रदेश ही नहीं देश की राजनीति में बड़ा प्रभाव डाल सकता है। अब क्योंकि उत्तर प्रदेश चुनाव में कुछ ही महीने शेष हैं और भाजपा सरकार के इतने साल बीत जाने के बाद यादवों के खिलाफ फैलाई गई नफरत का असर भी कम होने लगा है तो अन्य पिछड़ी जातियों के रुझान को कोई समझ नहीं पा रहा है।

यादवों के बाद आबादी के हिसाब से सबसे ज्यादा मौजूदगी रखने वाले कुर्मी समाज के कई बड़े नेताओं को समाजवादी पार्टी में शामिल कराने के साथ साथ अखिलेश यादव ने राजभर समाज में सबसे लोकप्रिय नेता ओमप्रकाश राजभर की पार्टी से भी गठबंधन कर लिया है। इसके साथ ही निषादों समेत तमाम ओबीसी जातियों के बीच काम कर रहे नेताओं के साथ मंच साझा करके अखिलेश यादव बार-बार संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि ओबीसी हितों की रक्षा वही करेंगे।

अगर वो पिछड़ों के बीच मनचाहा पैठ बनाने में सफल रहे तो निश्चित ही समाजवादी पार्टी की एक बड़ी सफलता मानी जाएगी।

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