adani modi

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अडानी-अंबानी जैसे पूंजीपतियों के बीच जो घनिष्ट संबंध हैं, उसके बारे में अक्सर चर्चा होती रहती है। पीएम की छत्र-छाया में इन कारोबारियों का कारोबार बहुत फला-फूला है। एक तरफ देश की जनता की जेब हलकी होती गई, तो दूसरी तरफ अडानी-अंबानी के व्यापार में तेज़ी आती गई। ऐसे में अगर गंगा एक्सप्रेस-वे जैसे बड़े प्रोजेक्ट का 80% हिस्सा बनाने का कॉन्ट्रैक्ट केवल अडानी की कंपनी को मिल जाए, तो सवाल तो खड़े होंगे ही।

योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बने हुए पांच साल पूरे होने वाले हैं। लेकिन यूपी चुनाव के कुछ महीने पहले ही पूर्ववर्ती सरकारों के कामों का फिर से शिलान्यास करने का सिलसिला जोर पकड़ चुका है।

जनता के पैसे से बन रहे 36,200 करोड़ के गंगा एक्सप्रेस-वे के ज़रिए मेरठ को प्रयागराज से जोड़ा जाएगा। अडानी की कंपनी -अडानी इंटरप्राइजेज लिमिटेड- का काम है-इस 594 किलोमीटर लंबे एक्सप्रेस-वे का 464 किलोमीटर हिस्सा बनाना। अडानी को उत्तर प्रदेश एक्सप्रेस-वे औद्योगिक विकास प्राधिकरण द्वारा इसके लिए स्वीकृति पत्र भी मिल गया है।

अडानी ग्रुप अपने प्रोजेक्ट को तीन चरणों में पूरा करेगा। सबसे पहले, बदायूं से हरदोई तक 151.7 किलोमीटर का निर्माण कार्य होगा। दूसरा, हरदोई से उन्नाव तक 155.7 किलोमीटर का निर्माण होगा। और तीसरा, उन्नाव से प्रयागराज तक एक्सप्रेस-वे का 157 किलोमीटर का हिस्सा बनाया जाएगा। ये एक्सप्रेस-वे छह लेन का होगा जिसे बाद में आठ लेन तक विस्तार दिया जा सकता है।

देश के होने वाले सबसे लंबे एक्सप्रेस-वे का सबसे लंबा हिस्सा, पीएम के करीबी मित्र अडानी की कंपनी बना रही है। मायावती द्वारा शुरू की गई इस  परियोजना का फिर से शिलान्यास करके BJP सरकार जनता को बहला रही है और मीडिया इसको मास्टरस्ट्रोक बता रही है। हेडलाइन्स के आगे का सच नहीं दिखा रही है।

एक तरफ आर्थिक असामनता से लोग परेशान हैं, तो दूसरी तरफ अडानी-अंबानी की दिन-दोगुनी रात चौगुनी तरक्की हो रही है। एक तरफ देश के शीर्ष 1% अमीरों के पास देश की 22% आय है और आधी आबादी (50%) के पास मात्र 13% आय है, तो वहीँ एशिया के पहले और दूसरे सबसे अमीर शख्स के तौर पर  अंबानी-अडानी का नाम है।

एक तरफ एक महीने में ही लाखों सैलरीड लोगों की नौकरियां खत्म हो जा रही हैं, तो दूसरी तरफ अडानी को कोयला से लेकर एक्सप्रेस-वे का कॉन्ट्रैक्ट मिल रहा है। क्या देश की तरक्की में ‘सबका साथ सबका विकास’ ज़रूरी नहीं है?

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