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राजधानी दिल्ली जहां से पूरे देश की दशा-दिशा तय होती है। तमाम राज्य ये दावा करते हैं कि दिल्ली की गद्दी का रास्ता उनके यहां से होकर जाता है। यानी इतना तो तय है कि पहुंचना सब दिल्ली ही चाहते हैं। लेकिन दिल्ली की जनता कहां पहुंचना चाहती है ये बता पाना थोड़ा मुश्किल है। कैसे मुश्किल है?

समझिए… साल 2014 में 16वीं लोकसभा के लिए चुनाव होता है। दिल्ली में लोकसभा की कुल सात सीटे हैं। इसमें से एक यानी ‘उत्तर पश्चिम दिल्ली’ लोकसभा सीट अनुसूचित जाति के प्रत्याशी के लिए आरक्षित है। दिल्ली की जनता अपनी सातों सीट पर बीजेपी के उम्मीदवारों को जितवा देती है।

सबको लगा दिल्ली की जनता भी कथित मोदी लहर में बह गयी। लेकिन ऐसा नहीं था। लोकसभा चुनाव के ठीक 9 महीने (फरवरी 2015) बाद जब दिल्ली विधानसभा का चुनाव होता है तो यही दिल्ली की जनता बीजेपी को बुरी तरह नकार देती है। बीजेपी को समझ नहीं आता कि ‘मोदी लहर’ कहां गई?

विधानसभा की 70 सीटों में से बीजेपी मात्र तीन पर जीत पाती है, बाकी 67 सीट आम आदमी पार्टी के झोली में जा गिरती है। इस तरह दिल्ली मोदी लहर पर सवालिया निशान लगाने वाला देश का पहला राज्य बन जाता है।

अब सवाल उठता है कि क्या फिर दिल्ली की जनता कुछ नया करने वाली है। क्योंकि कुछ ही महीनों में फिर लोकसभा चुनाव होने वाले हैं। चुनाव दर चुनाव करवट बदलने वाली दिल्ली, इस चुनाव में क्या करवट लेगी ये देखना दिलचस्प होगा।

2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 0 सीट देने वाली दिल्ली ने 2009 के चुनाव में अपनी सातों सीट कांग्रेस को दी थी। तब दिल्ली ने बीजेपी को 0 किया था।

फिलहाल दिल्ली की सातों लोकसभा सीट पर बीजेपी काबिज़ हैः

चांदनी चौक- डॉ हर्षवर्धन
पूर्वी दिल्ली- महेश गिरी
नई दिल्ली- मीनाक्षी लेखा
उत्तर पूर्वी- मनोज तिवारी
उत्तर पश्चिम दिल्ली- डॉ उदित राज
दक्षिणी दिल्ली- रमेश बिधूड़ी
पश्चिमी दिल्ली- प्रवेश साहिब सिंह वर्मा

बात शुरू करते हैं चांदनी चौक लोकसभा सीट से। वैसे बता दें कि चांदनी चौक लोकसभा क्षेत्र के अंदर 10 विधानसभा क्षेत्र आते हैं, इनमें से एक विधानसभा क्षेत्र का नाम भी चांदनी चौक ही है। यहां से विधायक हैं ‘आप’ नेता अल्का लांबा। वैसे चांदनी चौक लोकसभा क्षेत्र की सभी 10 विधानसभा सीटों पर आम आदमी पार्टी के विधायक ही हैं।

चांदनी चौकः

दिल्ली के सबसे तंग, व्यस्त और प्राचिन क्षेत्रों में से एक है चांदनी चौक। मुगलकाल की इमारतों से सजी संकरी गलियों की भूल भुलैया चांदनी चौक को ‘आधुनिक दिल्ली’ से अलग और खास बनाती है। चांदनी चौक में आज भी वो ‘दिल्ली’ जिंदा है जिसका जिक्र किताबों में मिलता है। लजीज जायके और हाथों की नक्काशी के उत्कृष्ट उत्पादों का थोक बाजार चांदनी चौक को कभी सूना नहीं होने देता।

मुगलकाल में चांदनी चौक की अहमियत क्या थी, इसे आप ऐसे भी समझ सकते हैं कि चांदनी चौक को खुद मुगल सम्राट शाहजहां की बेटी जहांआरा ने डिजाइन किया था।

मुगलकाल खत्म हुआ, अंग्रेजी शासन रहा फिर आज़ादी मिली लेकिन चांदनी चौक की महत्ता में कमी नहीं आयी। आज़ादी के बाद 1957 में चांदनी चौक लोकसभा क्षेत्र के रूप में भी जाना गया। 1957 के लोकसभा चुनाव में यहां से सांसद चुने गए कांग्रेस नेता राधा रमन।

वैसे 1957 और चांदनी चौक का एक और रिश्ता है। चांदनी चौक ही वो जगह हैं जहां के रहने वाले एक लड़के ने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की जान बचाई थी। इस बहादुरी के लिए उस 14 वर्षीय लड़के को भारत का पहला वीरता पुरस्कार मिला था।

दरअसल चांदनी चौक की कटरा नील में रहने वाले 14 वर्षीय हरीश चंद्र मेहरा स्काउट्स के ट्रूप लीडर थे। साल था 1957 तारीख थी दो अक्तूबर। हरीश मेहरा की ड्यूटी वीआईपी ब्लॉक में थी जहां तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू विदेशी प्रतिनिधियों के साथ रामलीला देख रहे थे।

बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में मेहरा बताते हैं कि ‘आतिशबाज़ी के कार्यक्रम के दौरान एक पटाखा उस शामियाने पर गिर पड़ा जिसके नीचे नेहरू जी और बाकी लोग थे। थोड़ी देर में ही वहां आग फैल गई, भगदड़ मच गई। नेहरू जी के पास कोई रास्ता नहीं रहा। तब मैं वहां पहुंच कर नेहरू जी का हाथ पकड़ कर उन्हें रामलीला के स्टेज तक लेकर गया।’

ख़ैर, सियासी समीकरण पर लौटते हैं… 1989 तक चांदनी चौक लोकसभा क्षेत्र कांग्रेस का गढ़ रहा। इस बीच सिर्फ दो बार कांग्रेस यहां से चुनाव हारी। चांदनी चौक लोकसभा सीट पर कांग्रेस को पहली शिकस्त मिली चाइना चुद्ध (1962) के बाद हुए 1967 के लोकसभा चुनाव में। उस साल कांग्रेस के शामनाथ को BJS के आर. गोपाल ने 17150 वोटों से हराया था।

कांग्रेस को दूसरी शिकस्त मिली इंदिरा के आपातकाल के बाद हुए 1977 के लोकसभा चुनाव में। उस साल कांग्रेस की सुभद्रा जोशी को BLD नेता सिकंदर बख्त ने 115989 से हराया था।

लेकिन 1990 के बाद चांदनी चौक लोकसभा सीट से कांग्रेस का एकाधिकार खत्म हुआ और टक्कर देने के लिए बीजेपी मैदान में आ गई। 1991 से लेकर 2014 तक 7 लोकसभा चुनाव हुए। 1991, 1998, 1999, 2014 में बीजेपी के प्रत्याशी ने जीत हासिल की और 1996, 2004, 2009 में कांग्रेस को सफलता मिली। यानी 4 बार बीजेपी के प्रत्याशी को जीत मिली और 3 बार कांग्रेस प्रत्याशी को।

2014 के बदला समिकरण-

2014 से पहले चांदनी चौक के मैदान पर सिर्फ कांग्रेस और बीजेपी ही खेलती थीं। लेकिन 2014 लोकसभा चुनाव के आंकड़े बताते हैं कि अब टक्कर देने के लिए मैदान में और भी पार्टियां है। 2014 में इस सीट पर कुल 69 फीसदी वोटिंग हुई थी। वोट देने वालों में 550,825 पुरुष थे और 431,038 महिलाएं। जबकि 2014 में इस सीट पर कुल 1,447,228 मतदाता थे, जिनमें से 791,317 पुरुष और 655,911 महिलाएं।

2014 लोकसभा चुनाव में चांदनी चौक सीट से जीत भले ही बीजेपी नेता हर्षवर्धन की हुई थी लेकिन जीत का अंतर बहुत मामूली था। वरिष्ठ बीजेपी नेता हर्षवर्धन को कुल 437938 वोट मिले थे और पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ने वाली आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार आशुतोष को 301618 वोट मिले थे।

यानी मात्र 136320 वोट ज्यादा। जबकि ‘आप’ प्रत्याशी आशुतोष को चुनाव लड़ने का कोई अनुभव नहीं था, वो पहले कभी चुनाव नहीं लड़े थे। दूसरी तरफ 1992 से ही चुनाव लड़ने वाले हर्षवर्धन पांच चुनाव जीतने के बाद इस चुनाव को लड़ रहे थे।

जहां तक कांग्रेस की बात है तो 2009 में चांदनी चौक से सांसद चुने जाने वाले वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल 2014 की लड़ाई में तीसरे नंबर पर थे। सिब्बल को महज 176206 वोट मिले थे। जबकि 2009 के लोकसभा चुनाव में कपिल सिब्बल को 465713 वोट मिले थे। मतबल कांग्रेस के 289507 वोट खिसक गए!

अब इन आंकड़ों से इतना तो साफ हो गया कि 2019 की लड़ाई सिर्फ कांग्रेस बीजेपी के बीच नहीं है। फिलहाल इस सीट पर कौन मजबूत है इसका अंदाजा इस बात से लगा लीजिए कि 2015 में हुए विधानसभा चुनाव में चांदनी चौक लोकसभा क्षेत्र के अंदर आने वाली 10 की 10 विधानसभा सीटों पर आम आदमी पार्टी का कब्जा है।

दूसरी तरफ सांसद डॉ हर्षवर्धन चुनाव-चुनाव ही अपने संसदीय क्षेत्र में नज़र आते हैं। सांसद चुने जाने के बाद हर्षवर्धन देश के स्‍वास्‍थ्‍य एवं परिवार कल्‍याण मंत्री बने। स्‍वास्‍थ्‍य के क्षेत्र में उन्‍होंने तमाम प्रयास किये, हालांकि नवंबर 2014 में ही उनका विभाग बदल दिया गया। अब हर्षवर्धन पृथ्‍वी विज्ञान मंत्रालय और पर्यावरण, वन एवं मौसम मंत्रालय के मंत्री हैं।

जहां तक क्षेत्र में जनता से मिलने जुलने की बात है तो इसपर डॉक्टर साहब ने ज्यादा जोर नहीं दिया है। 2019 का चुनाव नजदीक है ऐसे में वो एक बार फिर अपने संसदीय क्षेत्र में चुनाव कार्यालय का उद्घाटन करते दिखे। दूसरे तरफ आम आदमी पार्टी चांदनी चौक में चुनाव प्रचार शुरू कर चुकी है और अपने विकास कार्यों को गिनवा रही है।

कुल मिलाकर बात ये है कि आने वाले चुनाव में एक तरफ कांग्रेस बीजेपी से इस सीट को वापस लेने की पुरजोर कोशिश करेगी। वहीं दूसरी तरफ डॉ हर्षवर्धन को जनता वोट करेगी या नहीं ये आम आदमी पार्टी के दिल्‍ली में किये गये काम पर भी निर्भर करेगा। अगर आम आदमी पार्टी अपने किए गए काम को जनता तक पहुंचा देती तो हर्षवर्धन और कांग्रेस की राह मुश्किल हो सकती है।

हालांकि पिछले चुनाव परिणाम के आंकड़े देखें तो एक नया समीकरण बनता है, AAP और कांग्रेस का वोट शेयर भाजपा के वोट शेयर से कहीं ज्यादा हो जाता है। ऐसे में अगर AAP और कांग्रेस के बीच गठबंधन हुआ और एक दूसरे के वोट ट्रांसफर हो गए तो बीजेपी के लिए जीत नामुमकिन हो जाएगी।