15 मार्च को मान्यवर कांशीराम की जयंती मनाई जाती है, उनके मिशन से जुड़े करोड़ों लोग उन्हें याद करते हैं। हालांकि अखबार और टीवी मीडिया के लोग इस जयंती के कवरेज में कोई खास रुचि नहीं दिखाते हैं।

2022 में परिस्थितियां कुछ बदली हुई हैं, यूपी चुनाव के नतीजे अभी-अभी आए हैं और बसपा ने बेहद खराब प्रदर्शन किया है, शायद इसलिए इसबार मीडिया विशेष रुचि ले रहा है और टीवी चैनल भी मान्यवर कांशीराम की जयंती पर चर्चा के एपिसोड बना रहे हैं। लगभग सभी चैनलों पर यही बातें की जा रही हैं कि मायावती ने कांशीराम के मिशन को समेट दिया है। लगभग सभी पत्रकारों द्वारा ऐसी राय रखी जा रही है कि बसपा का नेतृत्व अब कमजोर हाथों में है।

मीडिया द्वारा बनाए जा रहे इसी तरह के नैरेटिव का उदाहरण है ‘यूपी तक’ चैनल पर जारी ये डिबेट शो। जिसमें थंबनेल के जरिए बताया जा रहा है ‘कांशीराम के मिशन को 1 सीट पर ले आईं मायावती!’

इस शो के पैनल में कुमार अभिषेक नाम का एक व्यक्ति कह रहा है ‘मायावती ने BSP को अर्श से फर्श तक ले आ दिया है।’

पहले तो यह देखना होगा कि मीडिया द्वारा किए जा रहे दावे में तथ्यात्मकता कितनी है, फिर समझने की कोशिश करते हैं कि पिछले 20 साल के मायावती के एकतरफा नेतृत्व में बसपा ने सफलता की ऊंचाइयों को छुआ है या फिर गर्त में गई है।

10 मार्च को चुनावी नतीजे आ रहे थे तो सबसे ज्यादा हैरान करने वाले आंकड़े थे-उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी के।

लगभग एक करोड़ 18 लाख मत पाने वाले इस दल के खाते में सिर्फ एक सीट आई, मत प्रतिशत में ये पार्टी तीसरे नंबर पर चली गई और सीट की संख्या में तो नौवें नंबर पर आ गई। हालांकि इसी दिन आ रहे चुनाव नतीजों में बसपा को उत्तराखंड में 2 सीटों पर और पंजाब में एक सीट पर सफलता मिली।

ये चार सीटें उस राजनीतिक दल के लिए नाकाफी ही मानी जाएंगी जो पिछले दो दशक से देश की तीसरी सबसे बड़ी राजनीति पार्टी बनी हुई है और अभी तक उत्तर प्रदेश में जनाधार के मामले में दूसरे नंबर की पार्टी बनी हुई थी। उत्तर प्रदेश में तो अभी भी ये दल लगभग सवा करोड़ मतों के साथ तीसरे नंबर पर बना हुआ है मगर ये मत सीटों में तब्दील नहीं हो पाए।

शायद इसीलिए बहुजन समाज पार्टी को एक सीट पर संतोष करना पड़ा जबकि कुछ लाख वोट पाने वाले तमाम दलों के पास सीटों की संख्या इससे ज्यादा है। जैसे कि अपना दल (S) के हिस्से कुछ लाख मत ही रहे मगर उसे 12 सीट पर सफलता मिली।

सीटों की संख्या की ही अगर बात की जाए तब भी बहुजन समाज पार्टी ने पिछले 5 साल में अलग-अलग विधानसभाओं में अलग-अलग संख्या में सफलता दर्ज की है। जैसे कि 2018 में हुए कर्नाटक विधानसभा चुनाव में एक सीट पर, 2018 के ही अंत में हुए मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनाव में 2 सीट पर, राजस्थान के विधानसभा चुनाव में 6 सीट पर, और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव में 2 सीट पर सफलता दर्ज की।

2019 के लोकसभा चुनाव में सपा और रालोद के साथ गठबंधन करके चुनाव लड़ने वाली बहुजन समाज पार्टी को 10 सीटों पर सफलता मिली। लोकसभा चुनाव के बाद झारखंड महाराष्ट्र और हरियाणा कोई खास सफलता पाने में नाकामयाब रही बहुजन समाज पार्टी को बिहार विधानसभा चुनाव में एक सीट पर विजय मिली। बंगाल, केरल, तमिलनाडु और असम के चुनाव में कोई भी सफलता पाने में नाकाम बहुजन समाज पार्टी 2022 के चुनाव में पंजाब, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में क्रमशः 1, 2 और 1 सीट जीतने में कामयाब रही।

क्योंकि उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी प्रमुख दल के रूप में रही है इसलिए एक सीट का ये आंकड़ा उसके लिए सबसे शर्मनाक है। और मत प्रतिशत में भी भारी गिरावट इसकी हार पर मुहर लगाता है। मगर हार-जीत की बाइनरी के बावजूद, इन पेचीदा आंकड़ों के बावजूद, इस तथ्यात्मक बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि बहुजन समाज पार्टी भाजपा और कांग्रेस के बाद देश की तीसरी सबसे विस्तृत पार्टी है, जिसके प्रतिनिधि फिलहाल 8 राज्यों में चुने गए हैं।

लोकसभा चुनाव में भी मत प्रतिशत के हिसाब से कई सालों से तीसरे नंबर पर रहने वाली ये पार्टी, इस बार चौथे नंबर पर रही। इसे भाजपा-कांग्रेस ही नहीं, तृणमूल कांग्रेस से भी कम वोट मिले। बाकी इसे देश के किसी भी राजनीतिक दल से ज्यादा वोट मिले।

वर्तमान लोकसभा में बसपा के 10 सांसद और राज्यसभा में 4 सांसद हैं।

देश के सबसे बड़े सदन में 14 प्रतिनिधियों और आठ अलग-अलग राज्यों में कुल एक दर्जन से ज्यादा विधायकों को पहुंचाने वाली पार्टी को एक सीट तक सिमटी हुई दिखाना मीडिया की धूर्तता का हिस्सा है। जबकि केंद्र और राज्यों के चुनाव में, इस दौर में भी 2 करोड़ से ज्यादा लोगों ने हाथी का बटन दबाया है, मायावती के नेतृत्व में अपना भरोसा जताया है।

अब मुख्य बिंदु पर चर्चा किया जाए तो इस सवाल का जवाब ढूंढना जरूरी है-क्या कांशीराम के नेतृत्व छोड़ देने के बाद, क्या मायावती के नेतृत्व संभालने के बाद, बसपा की दुर्गति हुई है?

1977 में मायावती इस बहुजन मिशन से जुड़ीं, 1984 में कांशीराम के नेतृत्व में बहुजन समाज पार्टी बनी। हालांकि इसके बाद से ही सभी चुनावों का प्रमुख चेहरा मायावती ही बनी रहीं।

बहुजन समाज पार्टी की स्थापना में मायावती भी बराबर की साझेदार रहीं मगर कांशीराम को ही संस्थापक के तौर पर प्रचारित किया गया। हालांकि इससे मायावती ने भी कभी ऐतराज नहीं किया क्योंकि वो कांशीराम को गुरू मानती रहीं। समय-समय पर उन्होंने इस पदवी को बार बार दोहराया ही। उनका कांशीराम के प्रति सम्मान और कांशीराम का उनके प्रति भरोसा, लगातार बरकरार रहा।

इस बीच तमाम राजनैतिक उतार-चढ़ाव का जिक्र करके विस्तार देने की जरूरत नहीं है। इसलिए उस पड़ाव पर चलते हैं जबसे मायावती को राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर नेतृत्व मिला है।

दिसंबर 2001 में जब मायावती को बसपा का नेतृत्व मिला तब तक लगभग सभी चुनाव में बसपा यूपी में तीसरे नंबर की पार्टी थी। हालांकि गठबंधन के जरिए यूपी में मायावती की दो बार सरकार बन चुकी थी और तीसरी बार सरकार बनने वाली थी। अन्य राज्यों में भी कुछ मत प्रतिशत के साथ बसपा की ठीक वही उपस्थिति थी, जैसे कि वर्तमान में है।

मायावती के नेतृत्व संभालने के बाद, और खासकर मान्यवर कांशीराम के निधन के बाद बहुजन समाज पार्टी ने सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया। बसपा प्रमुख ने तमाम ऐसे फैसले लिए जिससे देशभर की राजनीति में भूचाल आ गया। फैसलों पर चर्चा करके विस्तार देने के बजाय हम प्रदर्शन पर नजर दौड़ाते हैं।

2007 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बसपा को 206 सीटें मिली, मायावती की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी। यूपी में 30 फ़ीसदी से ज्यादा मत मिले। इसके साथ ही उत्तराखंड में भी बसपा का प्रदर्शन शानदार रहा। ये पार्टी लगभग 13% मत के साथ वहां की तीसरे नंबर की पार्टी बनी। कुछ महीनों बाद हुए हिमाचल और दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी यही प्रदर्शन रहा और उसके एक साल बाद मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनाव में शानदार प्रदर्शन करने में सफल रही।

इस बीच 2009 के लोकसभा चुनाव आया और बहुजन समाज पार्टी शानदार प्रदर्शन करते हुए उत्तर प्रदेश में 21 सांसदों के साथ सबसे ज्यादा वोट हासिल करने में कामयाब रही। देशभर में 6.17% मत हासिल करने के साथ बसपा तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी और उसकी सफलता का सिलसिला जारी रहा।

2007 से लेकर 2012 के बीच में ये पार्टी लगभग 10 राज्यों में शानदार प्रदर्शन करके भाजपा और कांग्रेस के सामने एक तीसरी चुनौती पेश करती रही। हालांकि इस बीच अन्ना आंदोलन, आम आदमी पार्टी के उभार और भाजपा-कांग्रेस की लड़ाई में देशभर का फोकस प्वाइंट बदल गया और बसपा भी राजनीति के केंद्र से साइड लाइन होती दिखी।

2012 के यूपी विधानसभा चुनाव में 80 सीटों तक सिमट जाने वाली बसपा ने लगभग 26 फ़ीसदी मत हासिल किए थे और 2014 के चुनाव में साढ़े 4 फ़ीसदी से ज्यादा मत हासिल करते हुए देश की तीसरे नंबर की पार्टी बनी रही। हालांकि 2014 के लोकसभा चुनाव में बसपा एक भी सीट हासिल करने में नाकामयाब रही। तब भी इस दल के उबरने के लिए उतनी ही बड़ी चुनौती बताई जा रही थी, जितनी इस समय बताई जा रही है।

2017 के चुनाव में लगभग 22 फ़ीसदी मत के साथ बसपा ने मात्र 19 सीटें हासिल की और सत्ता के केंद्र से और दूर होती गई। हालांकि इसके बाद लोकसभा चुनाव के लिए सपा बसपा और रालोद ने गठबंधन किया, जिसमें बसपा को सबसे ज्यादा 10 सीटों पर जीत मिली। गौरतलब है कि 2019 के चुनाव में भाजपा के सामने किसी भी राजनीतिक दल ने इतनी ज्यादा सीटों पर हिंदी भाषी क्षेत्रों में सफलता नहीं दर्ज की।

संभवतः अपने कोर वोटर्स की प्रतिबद्धता देख अति आत्मविश्वास का शिकार हुई मायावती 2022 में सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला दोहराते हुए अपनी जीत सुनिश्चित मान रही थीं। मगर उनकी सबसे बड़ी चूक थी-इस चुनाव को त्रिकोणीय समझना। भाजपा गठबंधन और सपा गठबंधन के बीच इस चुनाव में बसपा बहुत पीछे रह गई, अमूमन सपा से ज्यादा वोट पाने वाली बसपा इस बार 2 गुना से भी ज्यादा पीछे छूट गई।

बहुजन समाज पार्टी के खराब प्रदर्शन पर चिंतन करने का काम उसके नेताओं का है, ये दल वापसी कर सकेगा या नहीं कर सकेगा, इसकी जिम्मेदारी इसके कार्यकर्ताओं की है। मगर इस दल की दशा पर मीडिया की कवरेज और शब्दावली पूर्वाग्रह से ग्रसित पाई जाती है, जातिवादी और कुंठित दिखाई देती है। इन दिनों मायावती को कांशीराम के मिशन का दुश्मन बताया जा रहा है, जबकि उन्हीं के नेतृत्व बसपा सफलता की बुलंदियां छू सकी है।

वर्तमान के हालात पर भी चर्चा और आलोचना की जा सकती है मगर यहां तो खारिज करने की कोशिश की जा रही है। जिस दल को लोकसभा के चुनाव में 2.2 करोड़ से ज्यादा वोट मिले, 10 मार्च के चुनाव नतीजों में सवा करोड़ से ज्यादा वोट मिले हों। अलग-अलग राज्यों की विधानसभाओं में वर्तमान में लगभग दो करोड़ वोट मिले हों, उसको खत्म, डूब गई, जैसे शब्दावलियों के जरिए खारिज करने की कोशिश की जा रही है।

मीडिया का काम खबर दिखाना, चर्चा करना, आलोचना करना तो होना चाहिए मगर एजेंडा चलाना नहीं, इसलिए मीडिया को कथित पत्रकारिता से बाज आना चाहिए। मीडिया को बहुजनों का दुश्मन बताती रही है जो पार्टी, उसकी इस बात पर मुहर नहीं लगाना चाहिए।

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