Shyam Meera Singh

आपको क्या लगता है, आईपीएस संजीव भट्ट जिनसे सम्बंधित 20 साल पुराने मुकदमें को (जिसपर हाईकोर्ट ने स्टे लगा रखी थी) दोबारा शुरू करना और आज संजीव भट्ट की उम्रकैद की सजा मिलना एक सामान्य घटना है? संजीव भट्ट को हुई उम्रकैद की सजा के पीछे नरेंद्र मोदी और अमित शाह कनेक्शन क्या है! अगर इसे जानने की इच्छा है तो आपको थोड़ा रुककर पढ़ना पड़ेगा।

आपने ये तो सुना ही होगा कि नब्बे के दशक में लालकृष्ण आडवाणी जब रथ यात्रा निकाल रहे थे तब बिहार में उनकी गिरफ्तारी हो गई थी। जिसके विरोध में भाजपा और संघ द्वारा पूरे देशभर में भारत बन्द का आयोजन किया गया था। ऐसा ही एक विरोध गुजरात में भी हो रहा था। उस समय वहां संजीव भट्ट एक पुलिस अधिकारी(एसीपी) हुआ करते थे। पुलिस ने 130 उपद्रवियों की गिरफ्तारी की जिसमें से एक प्रभुदास नामक युवक भी था। हिरासत के 18 दिन बाद ही प्रभुदास की मौत हो जाती है। प्रभुदास के एक भाई ने पुलिस में रपट लिखवाई कि संजीव भट्ट एवं अन्य पुलिस अधिकारियों द्वारा हिरासत में की गई पिटाई के कारण उनके भाई यानी प्रभुदास की मौत हुई है। लेकिन इस आरोप को सच मानने से पहले आपको कुछ चीजों को जान लेना जरूरी है।

पहली बात कि गिरफ्तारी के 9 दिन बाद ही प्रभुदास को बेल मिल गई थी यानी प्रभुदास जेल से रिहा हो गए थे। उनकी मौत जेल में नहीं हुई थी जैसा कि अखबारों और टीवी की रिपोर्टिंग से आपको लग रहा होगा।

दूसरी बात कि स्वास्थ्य रिपोर्टों के अनुसार प्रभुदास की मौत गुर्दे (किडनी) की समस्या के कारण हुई थी।

तीसरी बात कि प्रभुदास के शरीर पर न तो आंतरिक न ही बाहरी चोट के निशान मिले थे।

चौथी बात कि प्रभुदास के भाई बजरंग दल और संघ से जुड़े हुए थे सम्भव है कि भारत बंद के समय होने वाले हुड़दंग को रोकते समय पुलिस के रवैए से नाराज होकर भी उन्होंने बदले की भावना से संजीव भट्ट और अन्य पुलिस अधिकरियों के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट की हो।

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खैर! संजीव भट्ट और अन्य पुलिसकर्मियों पर लगने वाले आरोप में दम न होने के कारण (जैसा कि सीआईडी ने अपनी जांच में पाया, कि लगाए गए आरोपों का संजीव भट्ट से कोई संबंध नहीं है) तत्कालीन गुजरात सरकार ने मुकदमा चलाने की अनुमति नहीं दी। आगे 1995 तक जब इस मामले में कुछ अधिक कार्यवाही नहीं हुई तो गुजरात हाईकोर्ट ने संजीव भट्ट पर चलने वाले मुकदमे पर स्टे लगा दी। ये पूरी कहानी इस मामले का बैकग्राउंड भर थी। असली कहानी अब शुरू होती है।

2011 में एसआईटी द्वारा गुजरात दंगों की जांच हो रही थी। जिसके संबंध में संजीव भट्ट सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा सौंपते हैं। हलफनामे के अनुसार ‘गोधरा कांड के बाद 27 फरवरी, 2002 की शाम मुख्यमंत्री के आवास पर हुई एक सुरक्षा बैठक में वे मौजूद थे। इसमें मोदी ने कथित तौर पर पुलिस अधिकारियों से कहा था कि हिंदुओं को अपना ग़ुस्सा उतारने का मौका दिया जाना चाहिए, स्पष्ट शब्दों में कहें तो संजीव भट्ट के अनुसार, नरेंद्र मोदी मुसलमानों से बदला लेने की बात कर रहे थे। बस यहीं से संजीव भट्ट नरेंद्र मोदी और अमित शाह के निशाने पर आ गए।

इसी शाम गुजरात सरकार ने संजीव भट्ट पर चलने वाले 20 साल पुराने केस को दोबारा से निकाल लिया जिसपर अब तक हाईकोर्ट ने पहले ही स्टे लगा रखी थी। मामले की सुनवाई दोबारा से शुरू की गई। संजीव भट्ट ने कई बार अदालत में कहा कि उन्हें SIT (Special Investigation Team) पर भरोसा नहीं है। मामले से सम्बंधित जिन 300 गवाहों की गवाही ली जानी थी उनमें से केवल 36 गवाहों की गवाही ली गई है। उन पुलिसकर्मियों की गवाही तो ली ही नहीं गई जिनके अनुसार संजीव भट्ट प्रभुदास की कस्टडी में हुई मौत के जिम्मेदार नहीं हैं।

संजीव भट्ट की मुसीबत यहीं कम नहीं हुई, बिना कारण बताए छुट्टी लेने के कारण एवं सरकारी गाड़ी के दुरुपयोग का आरोप लगाकर उन्हें सर्विस से निलंबित कर दिया गया। जैसे ही नरेंद्र मोदी की सरकार आई 2015 में संजीव भट्ट को उनके पद से बर्खास्त कर दिया गया। आज नतीजा आपके सामने है ही।

संजीव भट्ट को स्थानीय अदालत ने उम्र कैद की सजा दे दी है। एक ऐसे मामले में जिसमें अपराधी की मृत्यु जेल के बाहर हुई है, गुर्दे की समस्या के कारण हुई है। मैं इस संभावना से इनकार नहीं कर रहा कि सम्भव है पुलिस द्वारा उपद्रवियों को काबू करते समय बलप्रयोग किया गया हो। जिसके चलते 18वें दिन घर पर प्रभुदास की मौत हो गई हो। लेकिन पूरा केस कुछ सवाल छोड़ जाता है जिसके प्रश्नों के उत्तर आपको खुद तय करने होंगे-

1.अगर पुलिस ने प्रभुदास या अन्य अपराधियों को जेल में टॉर्चर किया भी था तो जब उन्हें स्थानीय मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया था तब इसकी शिकायत क्यों नहीं की थी? 18 दिन बाद मौत हो जाने के बाद ही क्यों शिकायत की गई ?

2.जेल के बाहर गुर्दा से सम्बंधित कमजोरी के कारण हुई मौत को कस्टडी में होने वाली मौत मानना कितना सही है? अगर कस्टडी में हुई मौत मान भी लिया जाए तो क्या इसे हत्या मानना सही है?

3.क्या इसके लिए उम्र कैद की सजा कुछ ज्यादा नहीं है ?

4.गुजरात में 1995 से लेकर 2012 के बीच लगभग 180 लोगों की मौत पुलिस कस्टडी में हुई है लेकिन सजा केवल संजीव भट्ट को ही क्यों? वो भी उम्रकैद की।

5.क्या संजीव भट्ट को मिली उम्रकैद की सजा नरेंद्र मोदी के सामने खड़े होने की सजा है?

आपको एक चीज और बताता हूँ कि संजीव भट्ट, नरेंद्र मोदी के साथ गोधरा कांड के बाद होने वाली जिस बैठक की बात करते हैं उसमें तत्कालीन गृह मंत्री हरेन पांड्या भी शामिल थे जिनकी हत्या सोहराबुद्दीन नाम के एक सख़्श के द्वारा कर दी गई थी। ये जानना इसलिए जरूरी है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि हरेन पांड्या को नरेंद्र मोदी से सम्बंधित गुप्त जानकारियों की खबर थी। नरेंद्र मोदी की हरेन पांड्या के साथ अनबन भी थी दोनों एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वी भी थे। आगे चलकर हरेन पंड्या की हत्या कर दी जाती है। इस केस से सम्बंधित एक गवाह के अनुसार सोहराबुद्दीन और तुलसीराम प्रजापति नामके दो व्यक्तियों ने तत्कालीन डीजी बंजारा के कहने पर गृह मंत्री हरेन पंड्या की हत्या की थी और सबको पता है कि डीजी बंजारा नरेंद्र मोदी के खासमखास नौकरशाह थे। बाद में आप सब जानते हैं 2005 में सोहराबुद्दीन को भी एक फर्जी एनकाउंटर द्वारा मरवा दिया गया था।

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कहा जाता है कि इसमें अमित शाह की भूमिका थी। उनकी कितनी भूमिका थी यह जांच का विषय है। चूंकि तुलसीराम प्रजापति भी इस मामले से जुड़ा हुआ ही था इसलिए उसकी भी मौत तय थी। बाद में गुजरात एवं राजस्थान पुलिस के साथ एक अन्य कथित फर्जी मुठभेड़ में प्रजापति भी मारा गया था। एक-दो साल पहले ही इस केस की सुनवाई कर रहे जस्टिस लोया की भी रहस्यमयी ढंग से मौत हो गई थी। उनकी मौत का आरोप नरेंद्र मोदी के दोस्त अमित शाह पर लगाया गया था।

आप इस गुत्थी को सुलझाते रहिएगा। इस गुत्थी को समझने लिए काफी पढ़ना पड़ेगा। व्हाट्सएप पर ये सब खबरें नहीं मिलेंगीं। संजीव भट्ट और उनके परिवार को इस बात की खुशी मनानी चाहिए कि उम्रकैद की सजा मिलने से अब वह जेल में चैन से अपने बचे-खुचे दिन तो काट सकेंगे। कम से कम उनका हश्र जस्टिस लोया, तुलसीराम प्रजापति, सोहराबुद्दीन, हरेन पांड्या की तरह नहीं होने जा रहा।

संजीव भट्ट “गुजरात फाइल” का एक चैप्टर मात्र हैं। “गुजरात फाइल” हजारों लोगों की मौत की कहानी है। जो हजारों गुत्थियों में उलझी हुई है। आप और हमारे लिए इसे समझना थोड़ा मुश्किल है। लेकिन जो लोग इस समय इस देश को चला रहे हैं उनका अतीत अगर ऐसा है तो देश का भविष्य क्या रहने वाला है इसकी कल्पना करना बहुत मुश्किल नहीं है।

(इस लेख में किए गए दावे युवा पत्रकार श्याम मीरा सिंह की अपनी जानकारी और विचार के आधार पर हैं, सभी दावों का सत्यापन एवं इनकी पुष्टि बोलता हिंदुस्तान नहीं करता है )