तस्वीर साभार-कार्टूनिस्ट मंसूर नक़वी
राजन राज

मीडिया हमसे पैसे कमाता है फिर इसी देश में ‘आग’ लगाता है- बताओ हम दंगे के जिम्मेदार हुए या नहीं ?

देश में लगी इस आग का जिम्मेदार कौन ? सरकार,मीडिया या आप ! पिछले 7 दिनों से लगातार दिल्ली जल रही है। अब तक 42 जानें जा चुकी हैं। 200 से ज्यादा लोग घायल हैं। दंगा अक्सर किसी एक घटना का परिणाम नहीं हो सकता है। दंगा एक लंबी समाजिक परिस्थितियों की उपज है।

पिछले कई सालों से भारतीय समाज में धर्म को लेकर जिस मानसिकता ने जन्म लिया है वही देश के अलग-अलग शहरों मे हो रहे दंगों का कारण है। लेकिन ऐसी समाजिक परिस्थितियां कैसी उत्पन्न होती हैं? किन उद्दीपकों के कारण लोग एक–दूसरे को मारने के लिए आतुर हो जाते हैं? वो कौन सा जरिया है जो लोगों को ऐसी मानसिकता के लिए भरपूर ट्रेनिंग देता है। दिल्ली के दंगों ने कहीं न कहीं मुझे इन सारे प्रश्नों का उत्तर दे दिया है। जो आपको भी जानना चाहिए।

इसका एक प्रमुख कारण ये भी है कि पिछले 5 सालों से मैं पत्रकारिता की पढ़ाई और काम दोनो से जुड़ा हुआ हूं। कई लोग लगातार भारतीय मीडिया की आलोचना कर रहे थे। हजारों लेख छप रहे थे। कई लोग टीवी पर बैठ कर न्यूज ना देखने की हिदायत दे रहे थे। लेकिन तमाम आलोचनाओं के बाद मै कहीं न कहीं इन सभी लोगों की बात को नहीं मान पा रहा था। लेकिन अब आत्मग्लानि हो रही है। आंखों के सामने हुई 42 मौतों का कसूरवार शायद मैं भी हूं। क्योंकि मैं भी उसी खूनी इंडस्ट्री का पार्ट हूं जिसने लोगों के दिमाग में लगातार जहर भरा है।

मैं अपने पिछले 5 साल इसी मीडिया इंडस्ट्री के सपने के साथ जीता आया हूं। लेकिन दिल्ली के दंगों ने मुझे भी दोषी बना दिया है। मै इस देश की तमाम जनता से , अल्पसंख्यकों से, उन सभी परिवारों से माफी मांगता हूं। मुझे नहीं पता कि आगे आने वाले दिनों में पत्रकारिता करूंगा या नहीं, मुझे ये भी नहीं पता कि आगे आने वाले दिनों में मैं कैसी पत्रकारिता करूंगा। लेकिन फिलहाल मन ही मन काफी व्यथित हूं।

अफवाहों का दौर चल रहा है, अगर आप अपनी दिल्ली को बचाना चाहते हैं तो गोदी मीडिया से दूर रहें : रवीश कुमार

पत्रकारिता जिसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है आज वो आदमखोर बन चुका है। वो समाज लगातार धर्म के नाम पर जहर घोल रहा है। उससे बचिए। मत देखिए टीवी, समाचार पत्रों को जला दीजिए। यही एक उपाय है वरना बहुत जल्द ये देश सीरिया बन जाएगा। मानवीय मूल्यों को ताक पर रख कर सिर्फ पैसे कमाने की जद्दोजहद कोई नया खेल नहीं है। इस देश में धार्मिक कट्टरता से लेकर जातीय हिंसा तक में मीडिया का ही हाथ है।

इस देश की मीडिया ने कभी भी समाजिक मूल्यों का सम्मान नहीं किया है। अगर आप इन बातों से इत्तेफाक नहीं रखते तो 90 के दशक की पत्रकारिता के बारे में पढ़िए । जब पूरी मीडिया मंडल कमीशन के खिलाफ खड़ी हो गई थी। गाड़ी,घर ,दुकानों को जलाने वाले युवाओं के सम्मान में कसीदे पढ़े जा रहे थे। ठीक वैसे ही जैसा आज हाथ में तलवार लेकर जय श्रीराम का नारा लगाने वाले युवकों को सम्मान बख्शा जा रहा है। हाथ में तलावार लिए अल्लाह के नाम पर लोगों का गला रेतने वाले लोग कहीं से भी सही नहीं है।

एक बड़ी भीड़ को हिंसा की आग में झोंकने वाले पत्रकारों को ये सोचना चाहिए कि क्या वो अपने बच्चों के साथ ऐसा व्यवहार करेगा। उसे उन गलियों में भेजेगा जहां जिहादी या देश के गद्दार रहते हैं ? या उसे ऑक्सफोर्ड और केंब्रीज भेजेगा ? भारतीय मीडिया के सबसे अच्छे संपादकों में से एक एस .पी सिंह ने लगातार इस बात को लेकर देश की जनता को अगाह किया था। लोगों को समझाने का प्रयास किया था। लेकिन कौन समझे यहां ? गणेश की मूर्ति ने जब दूध पिया तो एस.पी सिंह ने पूरे दम-खम के साथ इसे झुठला दिया। लेकिन उन्हें कहां पता था कि सूचनाओं का कारोबार करने वाली इंडस्ट्री भूत-प्रेत के बारे में जानकरियां बेचेगी और धीरे-धीरे पूरे देश की जनता को दंगाई बना देगी।

आप पिछले 6 सालों के प्राइम टाइम का आंकड़ा निकालिए और गिनती कीजिए कि कितनी बार मीडिया ने आपके रोजगार – स्वास्थय या बुनियादी मुद्दों पर चर्चा करने की हिम्मत जुटाई है। हर शाम 4 बजे से रामजादा और हरामजादा शो शुरू होता है और मुल्ला जी के बेइज्जती ना होने तक चलता रहता है। दंगा से संबधित खबरों को चलाने वाले न्यूज चैनलों के संपादक कितने बार ग्राउंड पर गए होंगे। उन्होंने किस लेवल पर सारी सूचनओं का पड़ताल किया होगा।

प्रशांत भूषण बोले- दिनरात हिंदू-मुस्लिम करने वाले पत्रकारों का भी ‘दिल्ली दंगों’ में अहम योगदान है

व्हाटसएप्प यूनिवर्सिटी में मिले वीडियों को आंख मूंद कर अपने प्राइमटाइम में चला देना कतई एक अच्छी पत्रकारिता के संकेत नहीं है। आज इस देश का ये हाल देखा नहीं जा रहा है। लेकिन कहीं न कहीं इस देश की जनता भी इन परिस्थितियों की जिम्मेदार है। हम ये जरूर कह सकते हैं कि आज मीडिया और सरकार दोनों ही अपने जिम्मदारी से भाग रहे हैं। लेकिन जनता क्या कर रही है ? सरकार छोड़िए इस देश की मीडिया जनता के सपोर्ट के बिना एक महीने तक भी सुचारु रूप से नहीं चल पाएगी।

ये देश गांधी- अंबेडकर और भगत सिंह का देश है। जिन्होंने अपनी जिम्मेदारी को समझते हुए अपना पूरा जीवन इस देश की सेवा में कुर्बान कर दिया। क्या उन्होंने कभी सोचा होगा कि आजादी के 70 साल बाद इस देश की जनता इतनी ज्यादा लापरवाह हो जाएगी कि अपने नागरिक मूल्यों से मुंह छुपाएगी ? मेरे प्रिय देशवासियों अब सब आपके हाथ में है। बचा लिजिए इस देश को । जला दीजिए सारे अखबारों को । बंद कीजिए देखना दंगाई न्यूज चैनल को। और रोक लीजिए इसे देश को सीरिया बनने से।

  • (राजन राज IIMC दिल्ली में हिंदी पत्रकारिता के छात्र हैं)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

13 + three =